नस्लीय भेदभाव को लेकर निकला खिलाड़ियों का दर्द

White House

अमेरिका में अश्वेत नागरिक जार्ज फ्लाइड की पुलिस द्वारा निर्मम हत्या के बाद शुरू हुए नस्लीय हिंसा का दौर थमता नजर नहीं आ रहा है। अमेरिका में 'ब्लैक लाइफ मैटर' के तहत अश्वेत नागरिकों के अधिकारों के लिए विरोध प्रदर्शन हो रहा है। 21वी सदी में हो रही नस्लीय हिंसा से पूरे विश्व में हलचल मच गई है। रंगभेद को लेकर खिलाड़ी भी मुखर होकर अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं। रंगभेद के शिकार हुए खिलाड़ी अपने साथ हुए अनुभवों को शेयर कर रहे हैं। वहीं पूरे विश्व में नस्लीय भेदभाव को लेकर चर्चा हो रही है।

नस्लवाद से आहत वेस्टइंडीज के क़िकेटर क़िस गेल ने इंस्टाग्राम पर लिखा है कि, 'नस्लवाद सिर्फ फुटबॉल में ही नहीं है,यह क़िकेट में भी होता है। वह भी पूरी दुनिया में रंगभेद का शिकार हुए हैं।' वेस्टइंडीज के ही क़िकेटर डेरेन सैमी ने ट्विटर पर लिखा है, 'आईसीसी और सभी क़िकेट बोर्ड की आवाज सुनना चाहता हूं। क्या आप मेरे जैसे लोगों के सामाजिक न्याय के लिए नहीं बोलेंगेॽ यह सिर्फ अमेरिका के बारे में नहीं है।यह चुप रहने का समय नहीं है। मैं आपको सुनना चाहता हूं।'

सोशल मीडिया इंस्टाग्राम पर इंग्लैंड के खिलाड़ी जोफ्रा आर्चर ने एक पोस्ट साझा किया है जिसमें उन पर दो बार नस्लीय टिप्पणी की गई है। उन्होंने लिखा है कि, 'मैंने इस पर प़तिक़िया देने के बारे में बहुत सोचा और मुझे उम्मीद है कोई इस तरह की बातों से रोज न जुझे। यह मंजूर करने लायक नहीं है और मेरे विचार में इस मुद्दे की अच्छी तरह से निपटना चाहिए।वही जापानी टेनिस खिलाड़ी नाओमी ओसाका, अमेरिकी बास्केटबॉल खिलाड़ी माइकल जॉर्डन सहित कई खिलाड़ियों ने रंगभेद के खिलाफ आवाज बुलंद किया है।'

भारत के तीन पूर्व क्रिकेटर भी कभी न कभी रंगभेद का शिकार हुए हैं। पूर्व तेज गेंदबाज लक्ष्मीपति बालाजी ने कहा है कि रंगभेद को लेकर कई बार टीम के खिलाड़ी की टिप्पणी भी असहज कर देती थी,जिसकी उपेक्षा कर अपना खेल खेलता रहा।

वहीं पूर्व गेंदबाज डोडा गणेश ने पूर्व सलामी बल्लेबाज अभिनव मुकुंद की पुरानी पोस्ट को साझा करते हुए लिखा, 'अभिनव मुकुंद की इस पुरानी कहानी ने मुझे मेरे दौर की नस्लीय टिप्पणीयो की याद ताजा कर दी, जब मैं खेला करता था। तब एक दिग्गज भारतीय खिलाड़ी भी इसका गवाह बना था। लेकिन इसने मुझे और मजबूत ही बनाया और मुझे भारत और कर्नाटक के लिए 100 मैच खेलने से यह नहीं  रोक पाया।

अभिनव मुकुंद ने अगस्त 2017 को अपने ट्विटर पेज पर लिखा था, 'मैं अपनी त्वचा के रंग को लेकर बरसों से अपमान झेलते रहा हूं। गोरा रंग ही लवली या हैंडसम नहीं होता।जो भी आपका रंग है, उससे सहज रहकर काम करें। बचपन से ही त्वचा के रंग को लेकर लोगों का रवैया हैरानी का सबब रहा है।'  

इन खिलाड़ियों के पीड़ा को महसूस किया जा सकता है। रंगभेद सामाजिक सद्भावना में कमी लाता है। जरूरत इस बात की है कि लोगों को काले गोरे के भेद से नहीं जानें बल्कि उनके योग्यताओं का सम्मान करें।

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