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Sawan 2021: आज से शुरू हो रहा है सावन का पवित्र माह, जानें महत्त्व और पूजा विधि

सावन का पवित्र महीना, जिसे शरवन के नाम से भी जाना जाता है, आ गया है और यह भगवान शिव की साधना में लीन होकर आनंद लेने का समय है। भारत में त्यौहार सभी समुदाय और समर्पण के बारे में हैं, और यह महीने भर चलने वाला उत्सव देवता से उनके आशीर्वाद लेने के समय है। दरअसल, सोमवार का दिन भगवान शिव की पूजा के लिए सबसे शुभ दिन बताया गया है। सावन सोमवार के व्रत को बहुत अहम माना गया है। बड़ी संख्या में महिलाएं और पुरुष यह व्रत करते हैं। अविवाहित लड़कियां मनचाहे साथी के लिए भगवान शिव का यह व्रत रखती हैं, वहीं सुहागिनें अपने सौभाग्य के लिए यह व्रत करती हैं। अविवाहित लड़के भी अपनी पसंदीदा लड़की से शादी करने के लिए यह व्रत रखते हैं।

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गुरु पूर्णिमा विशेषः गुरु की प्राप्ति और गुरुकृपा के लिए क्या करें?

गुरु प्राप्ति के लिए तीव्र मुमुक्षुत्व या तीव्र लालसा, तडप इन गुणों में से एक के कारण गुरु प्राप्ति जल्दी होती है और गुरुकृपा निरंतर रहती है। जिस प्रकार युवा अवस्था में कोई युवक दिन-रात किसी लड़की का प्रेम पाने के लिए प्रयास करता है, ‘‘मैं क्या करूं जिससे वह खुश हो जायेगी, यही विचार कर प्रयास करता है, वैसे ही गुरु मुझे अपना कहे, उनकी कृपा प्राप्त हो, इसके लिए दिन-रात इसी बात का चिंतन कर प्रयास करना आवश्यक होता है। कलियुग में, गुरु प्राप्ति और गुरुकृपा पिछले तीन युगों की तरह कठिन नहीं हैं। यहाँ ध्यान देने योग्य सूत्र यह है कि गुरु की कृपा के बिना गुरु प्राप्ति नहीं होती है। गुरु को पहले से ही पता होता है कि भविष्य में उनका शिष्य कौन होगा।

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Ganga Dussehra 2021: जानिए 10 दिनों तक चलने वाले त्योहार की तारीख, महत्व और शुभ मुहूर्त

गंगा दशहरा हिंदू धर्म में सबसे शुभ त्योहारों में से एक है। यह पवित्र नदी गंगा की उत्पत्ति को चिह्नित करने के लिए भक्तों द्वारा मनाया जाता है। हर साल ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा का पावन पर्व मनाया जाता है। इस साल ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि 20 जून को है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी गंगा दशमी (ज्येष्ठ के महीने) पर पृथ्वी पर आईं और भगीरथ के पूर्वजों को श्राप से मुक्त कर दिया। यही कारण है कि इस महीने और अवधि के दौरान देवी गंगा की पूजा की जाती है। यह त्यौहार 10 दिनों की अवधि के लिए मनाया जाता है।

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Parshuram Jayanti: आज है श्रीविष्णु के 6वें अवतार भगवान परशुराम का जन्मोत्सव, जानें इनके जीवन की बेहद मार्मिक पौराणिक कथाएं

अग्रतश्‍चतुरो वेदा: पृष्ठत: सशरं धनु: ।
इदं ब्राह्मम् इदं क्षात्रं शापादपि शरादपि ॥

अर्थ : चारों वेद कंठस्थ कर ब्राह्मतेज से संपन्न तथा क्षात्रतेज के प्रतीक धनुष्य-बाण पीठ पर धारण करनेवाले भगवान परशुराम विरोधियों को शाप से अथवा शस्त्र से परास्त करेंगे ।

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अक्षय तृतीया का महत्त्व: आज के दिन दिए गए दान की महिमा और मनाने की पद्धति

चैत्र के उपरांत आता है वैशाख । वैशाख शुक्ल तृतीया को अक्षय तृतीया कहते हैं । इसे उत्तर भारत में ‘आखा तीज’ भी कहा जाता है । इसे व्रत के साथ त्यौहार के रूप में भी मनाया जाता है । अनेक कारणों से अक्षय तृतीया का महत्त्व है । साढे तीन मुहुूर्तों में से एक पूर्ण मुहूर्त ‘अक्षय तृतीया’ पर तिलतर्पण करना, उदकुंभदान (उदककुंभदान) करना, मृत्तिका पूजन तथा दान करने का प्रघात है । पुराणकालीन ‘मदनरत्न’ नामक संस्कृत ग्रंथ में बताए अनुसार, ‘अक्षय तृतीया’ कृतयुग अथवा त्रेतायुगका आरंभदिन है । अक्षय तृतीया की संपूर्ण अवधि, शुभ मुहूर्त ही होती है । इसलिए, इस तिथिपर धार्मिक कृत्य करनेके लिए मुहूर्त नहीं देखना पडता । इस तिथि पर हयग्रीव अवतार, नरनारायण प्रकटीकरण तथा परशुराम अवतार हुए हैं । इस तिथि पर ब्रह्मा एवं श्रीविष्णु की मिश्र तरंगें उच्च देवता लोकों से पृथ्वी पर आती हैं । इससे पृथ्वीपर सात्त्विकता की मात्रा १० प्रतिशत बढ जाती है । इस कालमहिमा के कारण इस तिथिपर पवित्र नदियों में स्नान, दान आदि धार्मिक कृत्य करने से अधिक आध्यात्मिक लाभ होते हैं । इस तिथि पर देवता-पितर के निमित्त जो कर्म किए जाते हैं, वे संपूर्णतः अक्षय (अविनाशी) होते हैं । सनातन संस्थाद्वारा संकलित इस लेखमें अक्षय तृतीया का महत्त्व और  उसे मनाने का शास्त्रीय आधार जान लेंगे I इस वर्ष कोरोना की पृष्‍ठभूमि पर अनेक स्‍थानों पर यह त्योहार सदैव की भांति करने में मर्यादाएं हो सकती हैं । इस लेखमें कोरोना के संकटकाल के निर्बंध (यातायात बंदी) में भी अक्षय तृतीया कैसे मनाएं यह भी समझ लेंगे I