‘ढाई शंका’ ने मौलवी को डाला मुश्किल में!

Moulvi

एक चर्चित इस्लामिक स्टाल पर कुछे लोगों की भीड़ देखकर मैं भी वहां पहुँच गया। पता चला ‘कुरान-ए-शरीफ़’ की प्रति लोगों को मुफ़्त बाँटी जा रही है। शांति, प्रेम और आपसी मेलजोल को इस्लाम का संदेश बताया जा रहा था। खैर जिज्ञासावश मैंने भी मुफ़्त में कुरान पाने को उनका दिया आवेदन फॉर्म भरने की ठानी जिसमें वो नाम-पता और मोबाइल नम्बर लिखवा रहे थे ताकि बाद में लोगों से सम्पर्क किया जा सके।

एकाएक एक सज्जन अपनी धर्मपत्नी के साथ स्टाल में पधारे। सामान्य अभिवादन के पश्चात उन्होंने मुस्लिम विद्वान् के सामने अपना विचार रखा - मैं अपनी धर्मपत्नी के साथ इस्लाम स्वीकार करना चाहता हूँ।

यह सुन मुस्लिम विद्वान के चेहरे पर प्रसन्नत्ता की अनूठी आभा दिखाई दी। मुस्लिम धर्मगुरु ने अपने दोनों हाथ खोलकर कहा - आपका स्वागत है। लेकिन उन सज्जन ने कहा - इस्लाम स्वीकार करने से पहले मेरी ‘ढाई शंका’ है और आपको उनका निवारण करना होगा। यदि आप उनका निवारण कर पाए तो ही मैं इस्लाम स्वीकार कर सकता हूँ!

मुस्लिम विद्वान ने शंकित भाव से उनकी ओर देखते हुए प्रश्न किया - महोदय, शंका या तो दो हों या तीन! इस ‘ढाई’ शंका का क्या तुक है?

सज्जन ने मुस्कुराते हुए कहा - जब मैं शंका रखूँगा आप खुद समझ जायेंगे। यदि आप तैयार हो तो मैं अपनी पहली शंका आपके सामने रखूँ ?

मुस्लिम विद्वान् ने कहा - जी, रखिये...

सज्जन - मेरी पहली शंका है कि सभी इस्लामिक बिरादरी के मुल्कों में जहाँ मुस्लिमों की संख्या 50 फीसदी से ज्यादा है, मसलन ‘मुस्लिम समुदाय’ बहुसंख्यक हैं, उनमें एक भी देश में ‘समाजवाद’ नहीं है, ‘लोकतंत्र’ नहीं है। वहाँ अन्य धर्मों में आस्था रखनेवाले लोग सुरक्षित नहीं हैं। जिस देश में ‘मुस्लिम’ बहुसंख्यक होते हैं वहाँ कट्टर इस्लामिक शासन की माँग होने लगती है। मतलब उदारवाद नहीं रहता, लोकतंत्र नहीं रहता। लोगों से उनकी अभिवयक्ति की स्वतंत्रता छीन ली जाती है। आप इसका कारण स्पष्ट करें, ऐसा क्यों? मैं इस्लाम स्वीकार कर लूँगा!

मुस्लिम विद्वान के चेहरे पर एक शंका ने हजारों शंकाए खड़ी कर दीं। फिर भी उन्होंने अपनी शंकाओं को छिपाते हुए कहा - दूसरी शंका प्रकट करें...

सज्जन ने कहा- मेरी दूसरी शंका है, पूरे विश्व में यदि वैश्विक आतंक पर नज़र डालें तो इस्लामिक आतंक की भागीदारी 95 प्रतिशत के लगभग है। अधिकतर मारने वाले आतंकी ‘मुस्लिम’ ही क्यों होते है? अब ऐसे में यदि मैंने इस्लाम स्वीकार किया तो आप मुझे कौन-सा मुसलमान बनायेंगे? हर रोज़ जो या तो कभी मस्ज़िद के धमाके में मर जाता, तो कभी ज़रा-सी चूक होने पर इस्लामिक कानून के तहत दंड भोगने वाला या फिर वो मुसलमान जो हर रोज़ बम-धमाके कर मानवता की हत्या कर देता है! इस्लाम के नाम पर मासूमों का खून बहाने वाला या सीरिया की तरह औरतों को अगवाकर बाज़ार में बेचनेवाला! मतलब मैं मरने वाला मुसलमान बनूँगा या मारने वाला?

यह सुनकर दूसरी शंका ने मानो उन विद्वान पर हज़ारों मन बोझ डाल दिया हो। दबी-सी आवाज़ में उन्होंने कहा - अब बाकी बची आधी शंका भी बोल डालो?..

सज्जन ने मंद सी मुस्कान के साथ कहा - वो आधी शंका मेरी धर्मपत्नी जी की है। इनकी शंका ‘आधी’ इसलिए है कि इस्लाम नारी समाज को पूर्ण दर्जा नहीं देता। हमेशा उसे पुरुष की तुलना में आधी ही समझता है तो इसकी शंका को भी ‘आधा’ ही आँका जाये!

मुस्लिम विद्वान ने कुछ लज्जित से स्वर में कहा - जी मोहतरमा, फरमाइए!...

सज्जन की धर्मपत्नी जी ने बड़े सहज भाव से कहा - ये इस्लाम कबूल कर लें, मुझे इससे कोई आपत्ति नहीं किन्तु मेरी इनके साथ शादी हुए करीब 35 वर्ष हो गये। यदि कल इस्लामिक रवायतों-उसूलों के अनुसार किसी बात पर इन्हें गुस्सा आ गया और मुझे तीन बार तलाक कह दिया तो बताइए मैं इस अवस्था में मैं कहाँ जाऊँगी? यदि तलाक भी न दिया और कल इन्हें कोई पसंद आ गयी और ये उससे निकाह करके घर ले आये तो बताइए उस अवस्था में मेरा, मेरे बच्चों का, मेरे गृहस्थ जीवन का क्या होगा? तो ये है मेरी ‘आधी’ शंका है।

इस प्रश्न के वार ने मुस्लिम विद्वान को निरुत्तर कर दिया। उसने इन जवाबों से बचने के लिए कहा - आप अपना परिचय दे सकते हैं...

सज्जन ने कहा - मेरी शंका ही मेरा परिचय है। यदि आपके पास इन प्रश्नों का उत्तर होगा, हमारी ‘ढाई शंका’ का निवारण आपके पास होगा तो आप मुझे बताना।

सज्जन तो वहाँ से चले गये पर मौलाना साहब सिर पकड़कर बैठे रहे। इन शंकाओ का उत्तर मौलाना आज तक नहीं दे सके।