मत्स्य पालन से जुडे़ 13 हजार 3 सौ लोगों की स्थिति में होगा सकारात्मक बदलाव

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जगदलपुर: छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा राज्य में मछली पालन को कृषि का दर्जा दिया गया है। सरकार के इस फैसले से मछुआरों को मत्स्य पालन के लिए किसानों के समान ब्याज रहित ऋण सुविधा मिलने के साथ ही जलकर और विद्युत शुल्क में भी छुट का लाभ मिलेगा। इससे बस्तर जिले में मछली पालन को बढ़ावा मिलने के साथ ही इससे जुड़े 13 हजार 3 सौ लोगों की स्थिति में सकारात्मक बदलाव आएगा।

बस्तर जिले में बीते ढ़ाई सालों में छत्तीसगढ़ सरकार के प्रयासों से मछली पालन के क्षेत्र में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है। जिले में ढ़ाई सालों में मत्स्य बीज उत्पादन के मामाले में 18 प्रतिशत और मत्स्य उत्पादन में 6 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है। कृषि का दर्जा मिलने से मत्स्य पालन के क्षेत्र में जिला अब और तेजी से आगे बढ़ेगा। जिले में मत्स्य पालन के लिए अभी मछुआरों को एक प्रतिशत ब्याज पर एक लाख तक तथा 3 प्रतिशत ब्याज पर अधिकतम 3 लाख रूपये तक ऋण मिलता था। कृषि का दर्जा मिलने से अब मत्स्य पालन से जुडे लोग सहकारी समितियों से अब अपनी जरूरत के अनुसार शुन्य प्रतिशत ब्याज पर सहजता से ऋण प्राप्त कर सकेंगे। किसानों की भांति अब मत्स्य पालकों एवं मछुआरों को क्रेडिट कार्ड की सुविधा मिलेगी।

जिले में मछली पालन के लिए 3 हजार 540 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई बांधों एवं जलाशयों से नहर के माध्यम से जलापूर्ति आवश्यकता पड़ती थी, जिसके लिए मत्स्य कृषकों एवं मछुआरों को प्रति 10 हजार घन फीट पानी के बदले 4 रूपए का शुल्क अदा करना पड़ता था, जो अब उन्हे फ्री में मिलेगा। मत्स्य पालक कृषकों एवं मछुआरों को प्रति यूनिट 4.40 रूपये की दर से विद्युत शुल्क भी अदा नहीं करना होगा। सरकार के इस फैसले से मत्स्य उत्पादन की लागत में प्रति किलों लगभग 10 रूपये की कमी आएगी, जिसका सीधा लाभ मत्स्य पालन व्यवसाय से जुडे लोगों को मिलेगा। इससे उनकी आमदानी में इजाफा होगा और उनकी माली हालत बेहतर होगी।  

जिले में मत्स्य कृषकों मछुआरों को सरकार द्वारा दी जा रही सहूलियतों का ही यह परिणाम है कि बस्तर जिला मत्स्य बीज उत्पादन एवं मत्स्य उत्पादन में राज्य में 18 वें स्थान पर है। मछली पालन को कृषि का दर्जा मिलने से इसमें और बेहतर होगी। जिले में वर्तमान में 4 हजार 827 जलाशय और तालाब विद्यमान है जिनका जलक्षेत्र 3 हजार 632 हेक्टेयर है, इसमें से 4 हजार 538 जलाशयों एवं तालाबों का 3 हजार 540 हेक्टेयर जलक्षेत्र में मछली पालन के अन्तर्गत है, जो कुल उपलब्ध जलक्षेत्र का 97 प्रतिशत है।    

मत्स्य बीज उत्पादन के मामले में बस्तर जिला न सिर्फ आत्मनिर्भर है, बल्कि यहां से मत्स्य बीज की आपूर्ति पड़ोसी जिले कोंडागांव, सुकमा, दन्तेवाड़ा,बीजापुर तथा पडोसी राज्य में उड़ीसा को होती है। बस्तर जिले में वर्तमान में 375 लाख मत्स्य बीज तथा 7.47 हजार मैट्रिक टन मछली का उत्पादन प्रतिवर्ष होता है। जिले की मत्स्य उत्पादकता प्रति हेक्टेयर 3.20 मैट्रिक टन है, जो राज्य उत्पादकता 3.682 मैटिक टन से लगभग 0.482 मैट्रिक टन कम है।

लैंडलांक जिला होने के कारण राज्य के मत्स्य कृषकों एवं मछुआ समूहों द्वारा स्वयं की भूमि पर बडी संख्या में तालाबों का निर्माण कराकर मत्स्य पालन करना, मत्स्य क्षेत्र के विस्तार का अच्छा संकेत है। बीते ढ़ाई सालों में सरकार की मद्द से विभाग द्वारा 5 नवीन तालाब का निर्माण मत्स्य पालन के उद्देश्य से हुआ है। सरकार इसके लिए सामान्य वर्ग के मत्स्य कृषकों को अधिकतम 4.40 लाख रूपए तथा अनुसूचित जाति, जनजाति एवं महिला वर्ग के हितग्राहियों को 6.60 लाख रूपए की अनुदान सहायता तालाब निर्माण और मत्स्य आहार के लिए देती है। बायोफलाक तकनीकी से मत्स्य पालन को बढ़ावा देने के लिए मत्स्य कृषकों को 7.50 लाख रूपए की इकाई लागत पर 40 प्रतिशत की अनुदान सहायता दिए जाने का प्रावधान है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में 59 तालाबों का निर्माण मत्स्य पालन के उद्देश्य से किंया जा रहा है।

जिले में मत्स्य पालन को बढ़ावा देने और मत्स्य कृषकों मछुआरों को सहूलियत देने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा नवीन मछली पालन नीति तैयार की जा रही है। इसके लिए कृषि एवं जल संसाधन मंत्री श्री रविन्द्र चौबे की अध्यक्षता में गठित समिति ने मछुआरों को उत्पादकता बोनस दिए जाने, ऐसे एनीकट जिनका क्षेत्रफल 20 हेक्टेयर तक है, उसे स्थानीय मछुआरों के निःशुल्क मत्स्याखेट के लिए सुरक्षित रखने तथ मछुआ जाति के लोगों की सहकारी समिति को सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर जलाशयों को मछली पालन के लिए पट्टे पर देने की सिफारिश की है।