Gh1

आंशिक लॉकडाउन का वायु प्रदूषण स्तरों पर नहीं हुआ ख़ास असर, प्रदूषण स्तर को ट्रैक करना ज़रूरी

in Op-ed

पिछले साल की ही तरह, इस साल भी कुछ महीनों से, देश के कुछ हिस्से कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर के कारण पूर्ण या आंशिक लॉकडाउन में रहे हैं। लेकिन इस बार इन पूर्ण या आंशिक लॉकडाउन का कोई ख़ास साकारात्मक असर नहीं दिखा। वजह रही शायद इनकी टाइमिंग। वायरस की विभीषिका के बाद लॉक डाउन लगाया तो गया, लेकिन आंशिक। तब तक काफ़ी असर हो चुका था।

Plantation

बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण जैव विविधता के लिए हानिकारक: वैश्विक जैव विविधता पैनल

in Op-ed

इंसान की नुकसानदेह गतिविधियों के कारण जलवायु और जैव-विविधता में हुए अप्रत्‍याशित बदलाव अब एक साथ मिल गये हैं और इनकी वजह से पूरी दुनिया में कुदरत, मानव जीवन, रोजी-रोटी तथा लोक कल्‍याण के लिये खतरा बढ़ गया है। मानव द्वारा की जाने वाली आर्थिक गतिविधियां, जैव-विविधता को हो रहे नुकसान और जलवायु परिवर्तन दोनों का ही मूल कारण हैं और दोनों ही परस्‍पर रूप से एक-दूसरे को मजबूत करते हैं। जब तक दोनों को एक साथ इलाज नहीं किया जाएगा तब‍ तक समस्‍या का सफलतापूर्वक समाधान नहीं किया जा सकता। जैव-विविधता और जलवायु क्षेत्र से जुड़े दुनिया के 50 शीर्ष विशेषज्ञों द्वारा आज प्रकाशित वर्कशॉप रिपोर्ट में यही संदेश दिया गया है।

Glacier

पिघलते ग्‍लेशियर और जलवायु परिवर्तन की मार, कर रही है तीसरे पोल पर वार

in Op-ed

हिमालय और काराकोरम पर्वत श्रंखलाओं में जलवायु परिवर्तन के फुटप्रिंट बिल्‍कुल खुलकर ज़ाहिर हो गये हैं। इस क्षेत्र को तीसरा पोल भी कहा जाता है और यहां ग्‍लेशियर पिघल रहे हैं, नुकसानदेह परिघटनाएं हो रही हैं, बर्फबारी की तर्ज में बदलाव हो रहे हैं। ये उन देशों के लिये बुरी खबर है जो पानी की आपूर्ति के लिये इन पर्वत श्रंखलाओं से निकलने वाली नदियों पर निर्भर करते हैं। साइंस नामक जर्नल में आज प्रकाशित ताजा अध्‍ययन ‘ग्‍लेशियो-हाइड्रोलॉजी ऑफ द हिमालया-काराकोरम’ में इस बात पर जोर दिया गया है कि वर्ष 2050 के दशक तक पिघलने वाले ग्‍लेशियर के कुल क्षेत्र और प्रवाह के मौसमीपन में बढ़ोत्‍तरी होने का अनुमान है। इसमें कुछ अपेक्षाएं और बड़ी अनिश्चितताएं शुमार होंगी।

Pollution

गरीब मुल्कों की जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता हो कम, ये चाहते हैं हम: G7 देशों के नागरिक

in Op-ed

G7 देशों की बैठक से पहले, वैश्विक थिंक टैंक E3G के लिए YouGov संस्था ने G7 देशों में एक सर्वे किया जिसमें पाया गया कि वहां गरीब देशों की जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को कम करने में मदद करने के लिए भारी जन समर्थन है। कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, जापान, इटली, यूके और अमेरिका में हुए इस सर्वे में पाया गया कि सर्वे में हिस्सा लेने वालों में से 66% इसका समर्थन करते हैं।

सभी सात देशों की जनता चाहती है कि उनकी सरकार 2010 में संयुक्त राष्ट्र में किए गए वादों पर कायम रहे, जिसमें सालाना 100 अरब डॉलर का क्लाइमेट फाइनेंस मुहैया कराने का वादा किया गया था। सर्वे में हिस्सा लेने वालों में 50% चाहते हैं कि उनकी सरकार अपनी प्रतिज्ञा पर कायम रहे, जबकि केवल 29% को लगता है कि परिस्थितियाँ पर्याप्त रूप से बदल गई हैं और उनकी सरकार को अपनी प्रतिज्ञा को तोड़ना चाहिए।

G7 के नेता 11-13 जून के बीच यूनाइटेड किंगडम के कॉर्नवाल में वैक्सीन इक्विटी और क्लाइमेट फाइनेंस डिस्ट्रीब्युशन जैसे मुद्दों पर चर्चा करने के लिए मिलेंगे।

इस सर्वे की मुख्य बातें कुछ इस प्रकार हैं:

G7 के 50% मतदाता चाहते हैं कि उनकी सरकार अपनी प्रतिज्ञा पर कायम रहे, जबकि केवल 29% को लगता है कि परिस्थितियाँ पर्याप्त रूप से बदल गई हैं और उनकी सरकार को अपनी प्रतिज्ञा से पीछे हटना चाहिए।

G7 देशों में 51% लोग कहते हैं, "जलवायु परिवर्तन हम सभी को प्रभावित करता है, इसलिए यह मेरे देश के हित में है कि गरीब देशों को स्वच्छ ऊर्जा में परिवर्तन करने में मदद करें" जबकि सिर्फ 34% का कहना है कि उनकी सरकार को केवल अपने लोगों और देश पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

G7 के 43% मतदाता सोचते हैं कि अगर इनके बजाय रूस या चीन ने कदम बढ़ाये और इन गरीब देशों की मदद की तो इससे उनके देश की शक्ति और विदेशों में प्रभाव को नुकसान होगा।

सभी सात G7 देशों में उपायों के लिए समर्थन अधिक रहा, और इटली (85%) में सबसे अधिक था।

YouGov ने विकासशील देशों को स्वच्छ ऊर्जा में परिवर्तन के लिए वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान करने के लिए यूके के मतदाताओं के बीच भारी समर्थन दिखाया। इन उपायों को 64% मतदाताओं का समर्थन प्राप्त है, और केवल 23% ने इसका विरोध किया और 14% अनिश्चित थे।

46% विकासशील देशों के लिए जलवायु परिवर्तन समर्थन के पिछले वादों को तोड़ने का विरोध करेंगे, जबकि केवल 34% इसे महामारी द्वारा लाए गए बदलते बजट दबाव के संदर्भ में उचित मानते हैं।

अमेरिका का पक्ष रखते हुए E3G में वरिष्ठ सहयोगी, के ऐल्डन मायर, कहते हैं, "अमेरिकियों का एक स्पष्ट बहुमत चाहता है कि हमारी सरकार विकासशील देशों को स्वच्छ ऊर्जा में परिवर्तन करने में मदद करने के लिए वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान करे। वे समझते हैं कि यह न केवल जलवायु परिवर्तन के सबसे बुरे प्रभावों से बचने के लिए एक स्मार्ट रणनीति का एक अनिवार्य तत्व है, बल्कि यह हमारे आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा हितों में भी है।"

जर्मनी के बारे में E3G के जेनिफ़र टोलमैन, कहते हैं, "जब जलवायु वित्त प्रदान करने की बात आती है तो जर्मनी हमेशा अग्रणी रहा है लेकिन इस साल मर्केल ने गरीब देशों की आशा को निराश कर दिया। G7  शिखर सम्मेलन उनके (मर्केल) का, विकासशील देशों के लिए, जहां जलवायु प्रभाव बदतर हो रहे हैं और कोविड-19 हावी है, एकजुटता और दोहरे जलवायु वित्त पर बार बढ़ाने, आखिरी मौका है।

और फ्रांस के बारे में बताते हुए, E3G में बेटर रिकवरी यूनिट की प्रमुख, सिमा कम्मोरीह, के अनुसार, "फ्रांस वैश्विक स्तर पर एक लंबे समय से जलवायु चैंपियन है, और फ्रांसीसी आबादी देश इस सक्रिय नेतृत्व की भूमिका को जारी रखते देखना चाहती है। वह यह समझती है कि विकासशील देशों को स्वच्छ में संक्रमण का समर्थन करना सभी के हित में है, और राजनीतिक संबद्धता की परवाह किए बिना इस समर्थन को प्रोत्साहित करेगी इस चुनावी वर्ष में, इससे फ्रांसीसी सरकार को जलवायु-सुरक्षा के लिए वित्तीय एकजुटता के महत्वाकांक्षी एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त विश्वास देना चाहिए।”--

Mumbairain

डम्बल इफेक्ट बढ़ाएगा मानसून में मुंबई की परेशानी, जलवायु परिवर्तन का असर भी साफ़

in Op-ed

अभी हाल ही में हमने मुंबई में अत्यंत भयंकर चक्रवात तौकते को अपना कहर बरपाते हुए देखा था, और अब, मुंबई में मानसून ने अपने आगमन के पहले ही दिन शहर को अस्त व्यस्त कर के रख दिया है।

सांताक्रूज ऑब्जर्वेटरी ने बुधवार सुबह 8:30 बजे से 24 घंटे के अंतराल में 231 मिमी बारिश दर्ज की। हालांकि, मुंबई के लिए यह कुछ असामान्य नहीं है क्योंकि शहर में हर साल मानसून के मौसम में कई बार ट्रिपल डिजिट में बारिश होती है। लेकिन इस बार मौसम विज्ञानियों के अनुसार, मुंबई मानसून का एक बहुत ही ख़ास पैटर्न है और उन्होंने चेतावनी दी है मुंबई में बाढ़ जैसी स्थिति बन सकती हैं।