मौजूदा वक्त में कश्मीर मसले पर ध्यान देने की आवश्यकता

आजादी के साथ देश को मिली कश्मीर समस्या का हल यूं चलते-फिरते तो हो नहीं सकता, यह बात सभी जानते भी हैं और मानते भी हैं। इसलिए कहा जाता है कि शांति के साथ मिल-बैठकर हल खोजा जाना चाहिए, क्योंकि यह भी तय है कि इस गंभीर समस्या का हल सैन्य कार्रवाई भी नहीं हो सकती है। इसे देखते हुए हिंदुस्तान और पाकिस्तान की सरकारों को लगातार बातचीत करते रहने और एक-दूसरे के क्षेत्रों में हस्तक्षेप नहीं करने की समझाइश भी दी जाती रही है। इस समझाइश को जिन्हें नहीं मानना है वो तरह-तरह के हीला-हवाला करते देखे जाते हैं। ऐसे विघ्नकारी कारक समस्या को लगातार गंभीर बनाने की कोशिश में लगे रहते हैं। यही नहीं बल्कि वो चाहते हैं कि कश्मीर समस्या अंतर्राष्ट्रीय समस्या बन जाए और फिर वो दूर बैठकर तमाशा देख सकें। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि जो समस्या को बढ़ा रहे हैं वो अपने देश को भी संभालने में नाकाम साबित होते चले जा रहे हैं। इसमें मुख्य भूमिका पाकिस्तान की ही रही है। मुख्य वजह नफरत की नींव पर तैयार हुई पाकिस्तान की राजनीतिक इमारत है। इसलिए इस देश का खेबनहार जो भी होता है वह आवाम का ध्यान असली समस्याओं से भटकाने के लिए कश्मीर मुद्दे रुपी आग को भड़काने में लग जाता है।

दरअसल देखने वाली बात यह भी है कि एक तरफ हिंदुस्तान है जिसने आजादी के बाद से ही शांति और सद्भाव व सहअस्तित्व को अपनाते हुए तरक्की के रास्ते को चुना। इसका नतीजा आज भारत अपने दम पर दुनिया के साथ कदमताल करता नजर आता है, जबकि नफरतों की आंधी पर यकीन करने वाला पाकिस्तान खासतौर पर उसके हुकमरानों ने देश को तबाह करने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी है। नतीजे में दूसरों की बैसाखी के सहारे आज भी पाकिस्तान लंगड़ाते हुए आगे बढ़ रहा है। इस समय उसके आर्थिक हालात रेंगने जैसे हो गए हैं। आतंकवाद और दुनियाभर के आतंकवादियों को पालते हुए देश के कर्ता-धर्ताओं ने अपनी ही आवाम के लिए मुसीबतों का पहाड़ खड़ा कर दिया है। इससे छुटकारा पाने के लिए कोई दूसरा तो आएगा नहीं इसलिए पाकिस्तान की आवाम को ही समय रहते इस दिशा में आगे आना होगा। शांति और सहअस्तित्व के रास्ते को अपनाना होगा और कोशिश करनी होगी कि किसी और का नुक्सान करने की बजाय अपना भला करने वाली नीति को अपनाया जाए। संभव है कि इससे पाकिस्तान को स्थाई हो चली आतंकी समस्या से भी निजाद मिल जाए। बहरहाल यह सब बातें तो सुधारवादी हैं, लेकिन जो असली समस्या सामने दिखाई दे रही है वो अन्य देशों का इस आग में होम करने की है। यहां यह सब इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि पाकिस्तान की इमरान सरकार भी अपनी पू्र्ववर्ती सरकारों की ही तरह लगातार कश्मीर समस्या को अंतर्राष्ट्रीय बनाने में तुली हुई है। वो अपने आकाओं से इस मसले पर बोलने और हस्तक्षेप करने की जिद कर रहे हैं, लेकिन सभी समझते हैं कि यह समस्या महज बातचीत से ही हल हो सकती है, इसलिए कोई आगे आने को तैयार नहीं है।

बहरहाल इसी संदर्भ में अब नॉर्वे की प्रधानमंत्री एर्ना सोलबर्ग का बयान सामने आया है, जिसमें उन्होंने कहा है कि भारत और पाकिस्तान बड़े देश हैं और वे बगैर किसी बाहरी मदद के खुद ही द्विपक्षीय तनावों को कम कर सकते हैं।

यहां गौर करने वाली बात यह भी है कि नॉर्वे की पृष्ठभूमि भी संघर्षों वाली रही है और जब उसने इनसे अपने दामन को छुटकारा दिलाया और दूसरों की भी मदद करने में सफलता हासिल की है तो फिर उनसे तो यह पूछा ही जाना चाहिए था कि आखिर कश्मीर समस्या का हल भी उसी तरह से क्योंकर नहीं निकल सकता जैसे कि उनके देश ने निकाला था। इसके साथ ही मध्यस्थ की हैसियत से समस्याओं का समाधान खोजने में जो भूमिका उनकी रही है उस स्थिति में कश्मीर समस्या पर सवाल किए जा रहे थे। ऐसे ही आशय के सवालों का जवाब देते हुए नार्वे की प्रधानमंत्री सोलबर्ग कहती दिखती हैं कि नॉर्वे ने विवादों के शांतिपूर्ण हल निकालने के लिए मध्यस्थ के तौर पर काफी काम किए हैं। जहां तक कश्मीर समस्या की बात है तो उनकी सरकार की स्पष्ट नीति है कि किसी के मदद मांगने पर ही उसे मदद दी जाए। इसके साथ ही उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि कोई बाहरी व्यक्ति या देश कभी किसी के घर में या देश में शांति नहीं ला सकता है और न ही किसी प्रकार का कोई बदलाव ही ला सकता है। इसके लिए तो स्वयं को तैयार करना होगा और स्वयं से समस्या का समाधान तलाशा जाना होगा, तभी स्थाई हल निकल सकता है। इसी के साथ जब सोलबर्ग यह कहती हैं कि यदि व्यापक वार्ता के लिए भारत और पाकिस्तान में कोई गतिविधि हो रही है तो अन्य देश मदद कर सकते हैं, लेकिन उसकी प्रक्रिया वार्ता के साझेदार देश ही तय करेंगे। इससे यह जरुर संदेश जाता है कि कश्मीर समस्या को अंतर्राष्ट्रीय समस्या बनने से पहले ही केंद्र सरकार को बातचीत के लिए माहौल बनाने की बात पाकिस्तान के हुक्मरानों से कहनी चाहिए, क्योंकि वो तो यही कहते रहेंगे कि वो वार्ता करने को तैयार हैं, लेकिन समस्या को बढ़ाने के लिए भी लगातार प्रयास करते रहेंगे। यहां यह समझना होगा कि समस्या बढ़े उससे पहले ही हल खोजने की दिशा में आगे कदम बढ़ा दिया जाए।

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