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पैसे की गर्मी का असर

मरना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। जीवित रहने वाला प्रत्येक प्राणी मृत्यु की ओर प्रतिपल, प्रतिक्षण बढ़ता ही जाता है और शेष में अन्त के साथ मिलकर अपने दृश्य स्वरूप को निःशेष कर डालता है। मृत्यु के इस अवश्यम्भावी स्वरूप का रोना-धोना मेरे ही लिए नहीं अपितु सबके लिए कायरता है। सिद्धान्त की दृष्टि से देखिए या आदर्श की दृष्टि से किनारा एक ही है जहां पहुंच कर जीवन की किश्ती एक करवट लेती है और उसके बाद क्या होता है इस पर मैं कुछ कहना भी नहीं चाहता।  

Brahmin

झूठः दिल को छू लेने वाली एक युवा ब्राह्मण की कथा!

चेष्टा करने पर भी हंसी को रोक न सकी। भुवनेश्वर की चंचल पुत्रवधू घूंघट की आड़ से उस नवीन पुरोहित को देखती जाती और होम-कुण्ड की आग को पंखे से तेज करती जाती थी।

पति ने आंखें दिखायीं। वधू ने मुंह तो अवश्य ही फेर लिया, किन्तु हंसी न रोक सकी। शायद उसके लिए असाध्य रही हो। उसकी हंसी का कारण कहीं हटा तो था नहीं, फिर वह गम्भीर बनती ही कैसे? वह तेजस्वी ब्राह्मण युवक कुशासन पर बैठा उसी के श्वसुर भुवनेश्वर का श्राद्ध करा रहा था। बूढ़े मिश्रजी का छोटा भाई नारायण था, जो कि प्रथम बार ही यजमान के घर आया था एवं ऐसे दायित्वपूर्ण काम पर बैठा था। कुछ शर्माता झेंपता सा काम कर रहा था। लोगों की तीक्ष्ण दृष्टियां उस पर गड़ी हुई थीं, सहस्त्रों कान सतर्क थे- उसके विधि-नियमों और संस्कृत श्लोकों पर, परन्तु नहीं, भूल, त्रुटि, अशुद्धि कहीं पर भी कुछ न निकली, नहीं तिल बराबर भी नहीं। स्वास्थ्य-सबल पर लोटता हुआ शुभ्र यज्ञोपवीत का गुच्छा उसके सौन्दर्य को और भी बढ़ा रहा था। सफेद चन्दन का टीका उसके महन्व को और नामावली उसकी निष्ठा, श्रद्धा का। मिश्रजी बीमार थे, इसलिए नारायण को यजमान के घर भेजा था। शहर के प्रायः सभी लोगों के पुरोहित मिश्र थे। बस, वधू की हंसी का कारण-छोटा सा पुरोहित ही था। बूढ़े मिश्रजी को देखने में उसकी अभ्यस्त आंखे उस लड़के को देखकर परिहास से मचल रही थीं। हां, उसके विचार से नारायण लड़का ही था। यद्यपि वह स्वयं बालिका थी, फिर भी उसके विचार में नारायण था एक बच्चा। भला बच्चे भी कहीं पुरोहित बने हैं? वह विज्ञ भाव से निश्चय पर पहुंच गयी- ऐसे बालक भी कभी पूजा-पाठ, विधि-नियमों को कर सकते हैं? और फिर श्राद्ध। नहीं, नहीं। तो इसे बुलाया ही क्यों? जरूर मां के साथ ही साथ वे भी सठिया गये हैं।

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स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाएं लखपति बनने की राह पर

नई दिल्ली: ग्रामीण विकास मंत्रालय ने महिलाओं को उच्च आर्थिक क्रम में ले जाने पर अधिक ध्यान देने के लिए, स्वयं सहायता समूह (SHG) से जुड़ी ग्रामीण महिलाओं को लखपति बनाने के लिए एक पहल की शुरुआत की। इसका उद्देश्य ग्रामीण एसएचजी महिलाओं को प्रति वर्ष कम से कम 1 लाख रुपये कमाने में सक्षम बनाना है। इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल करने के लिए मंत्रालय ने अगले 2 वर्षों में 2.5 करोड़ ग्रामीण एसएचजी महिलाओं को आजीविका सहायता प्रदान करने की योजना बनाई है। देश भर में मौजूद विभिन्न मॉडलों के आधार पर राज्य सरकारों को एक विस्तृत एडवाइजरी जारी की गई है। 28 अक्टूबर, 2021 को इस विषय पर विशेष चर्चा के लिए राज्यों, बीएमजीएफ (बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन) और टीआरआईएफ (ट्रांसफोमेशन रूरल इंडिया फाउंडेशन) के साथ एक हितधारक परामर्श कार्यशाला आयोजित की गई थी।

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धन-संपत्ति में वृद्धि के लिए दीपावली में माता लक्ष्मी को कैसे करें प्रसन्न?

दिवाली रोशनी से भरा ऐसा पर्व है, जो हर किसी की जिंदगी को रोशन और खुशहाल बनाता है, इस दिन लोग अपने घर, दफ्तर, दुकान, प्रतिष्ठान हर जगह दीए जलाकर मां लक्ष्मी का स्वागत करते हैं। इस वर्ष दिवाली पर्व 4 नवंबर, बृहस्पतिवार को मनाया जाएगा। आज हम आपको बता रहें है कि दीपावली में माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए क्या-क्या करें ताकि आपकी धन-संपत्ति में वृद्धि होः-

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बच्चों में ध्यान की कमी एवं अतिक्रियशीलता में अभिभावकों की भूमिका

यदि आपका बच्चा सामान्य से अधिक उछल- कूद करता है, कभी चुप नहीं बैठता, यहां तक कि स्कूल में कक्षा में अध्यापक के सामने भी टिक कर नहीं बैठ पाता, किसी एक कार्य में ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाता तो बच्चे को ए.डी.एच.डी. (एटैंशन डेफिसिट हाइपर एक्टीवीटी डिसआरडर) ध्यान में कमी व अतिक्रियशीलता हो सकता है। यह एक व्यवहार संबंधी रोग है जो लड़कों में अधिक होता है। ऐसे बच्चों में सामान्य लालन-पालन के तरीके पूरी तरह से काम नहीं करते इसलिए माता-पिता को भी अपने व्यवहार में कुछ बदलाव लाने पड़ते हैं। इस रोग में कुछ हद तक दवाएं भी काम करती हैं लेकिन व्यवहार के बहुत से पहलू दवा से ठीक नहीं होते और उन्हें ठीक करने के लिए माता-पिता एवं परिवारगण विशेष भूमिका निभा सकते हैं। ऐसे बच्चों का माता-पिता होना वास्तव में ही एक चुनौती है, क्योंकि इन बच्चों में अन्य बच्चों की अपेक्षा अपना आन्तरिक नियंत्रण बहुत कम होता है। अतः माता-पिता को इनके साथ विशेष तरीके अपनाने पड़ते हैं।