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एक ऐसे संत जिसके पैरो के नीचे अपना सिर रखने नेता व अंग्रेज तक आते थे!

देवरहा बाबा का जन्म अज्ञात है। यहाँ तक कि उनकी सही उम्र का आकलन भी नहीं है। वह यूपी के देवरिया जिले के रहने वाले थे। मंगलवार, 19 जून सन् 1990 को योगिनी एकादशी के दिन अपना प्राण त्यागने वाले इस बाबा के जन्म के बारे में संशय है। कहा जाता है कि वह करीब 900 साल तक जिन्दा थे। (बाबा के संपूर्ण जीवन के बारे में अलग-अलग मत है, कुछ लोग उनका जीवन 500 साल तो कुछ लोग 950 साल मानते हैं.)

भारत के उत्तर प्रदेश के देवरिया जनपद में एक योगी, सिद्ध महापुरुष एवं सन्तपुरुष थे देवरहा बाबा. डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद, महामना मदन मोहन मालवीय, पुरुषोत्तमदास टंडन, जैसी विभूतियों ने पूज्य देवरहा बाबा के समय-समय पर दर्शन कर अपने को कृतार्थ अनुभव किया था. पूज्य महर्षि पातंजलि द्वारा प्रतिपादित अष्टांग योग में पारंगत थे।

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योग्य पेय पीने पर सकारात्मकता निर्माण होती है: शोध

सकारात्मक प्रभामंडलवाले पेय पदार्थों का हम पर विलक्ष्ण सकारात्मक प्रभाव होता है । इसलिए शारीरिक और मानसिक दोनों स्तरों पर स्वास्थ में सुधार होता है और रोगों का संकट अल्प होता है, साथ ही नकारात्मक कष्ट होने की संभावना भी अल्प होती है, ऐसा प्रतिपादन महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय के श्री. शॉन क्लार्क ने किया ।लंडन, युनाइटेड किंगडम में आयोजित 'सेवनटीन इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन न्यूट्रिशन एंड हेल्थ' इस अंतरराष्ट्रीय परिषद में वे बोल रहे थे । इस परिषद का आयोजन 'अलाईड एकॅडमीज, यूके' ने किया था । श्री. क्लार्क ने 'पेय पदार्थों का व्यक्ति पर आध्यात्मिक दृष्टि से होनेवाला परिणाम', यह शोधनिबंध प्रस्तुत किया । इस शोधनिबंध के लेखक महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय के संस्थापक परात्पर गुरु डॉ. जयंत बाळाजी आठवलेजी तथा सहलेखक श्री. शॉन क्लार्क हैं ।

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क्या सचमुच 84 लाख योनियों में भटकना होता है?

हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार जीवात्मा 84 लाख योनियों में भटकने के बाद मनुष्य जन्म पाता है। अब सवाल कई उठते हैं। पहला यह कि ये योनियां क्या होती हैं? दूसरा यह कि जैसे कोई बीज आम का है तो वह मरने के बाद भी तो आम का ही बीज बनता है तो फिर मनुष्य को भी मरने के बाद मनुष्य ही बनना चाहिए। पशु को मरने के बाद पशु ही बनना चाहिए। क्या मनुष्यात्माएं पाशविक योनियों में जन्म नहीं लेतीं? या कहीं ऐसा तो नहीं कि 84 लाख की धारणा महज एक मिथक-भर है? तीसरा सवाल यह कि क्या सचमुच ही एक आत्मा या जीवात्मा को 84 लाख योनियों में भटकने के बाद ही मनुष्य जन्म मिलता है? आओ इनके उत्तर जानें...

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शुभभावना और शुभकामना की सूक्ष्म सेवा

आज विश्वकल्याणकारी बापदादा अपने विश्वकल्याणकारी साथियों को देख रहे हैं। सभी बच्चे बाप के विश्व-कल्याण के कार्य में निमित्त बने हुए साथी हैं। सभी के मन में सदा यही एक संकल्प है कि विश्व की परेशान आत्माओं का कल्याण हो जाये। चलते-फिरते, कोई भी कार्य करते मन में यही शुभभावना है। भक्ति-मार्ग में भी भावना होती है। लेकिन भक्त आत्माओं की विशेष अल्पकाल के कल्याण प्रति भावना होती है। आप ज्ञानी तू आत्मा बच्चों की ज्ञानयुक्त कल्याण की भावना आत्माओं के प्रति सदाकाल और सर्वकल्याणकारी भावना है। आपकी भावना वर्तमान और भविष्य के लिए है कि हर आत्मा अनेक जन्म सुखी हो जाए, प्राप्तियों से सम्पन्न हो जाए क्योंकि अविनाशी बाप द्वारा आप आत्माओं को भी अविनाशी वर्सा मिला है। आपकी शुभ भावना का फल विश्व की आत्माओं को परिवर्तन कर रहा है और आगे चल प्रकृति सहित परिवर्तन हो जायेगा। आप आत्माओं की श्रेष्ठ भावना इतना श्रेष्ठ फल प्राप्त कराने वाली है! इसलिए विश्वकल्याणकारी आत्माएं गाई जाती हो। इतना अपनी शुभभावना का महत्व जानते हो? अपनी शुभभावना को साधारण रीति से कार्य में लगाते चल रहे हो वा महत्व जानकर चलते हो? दुनिया वाले भी शुभभावना शब्द कहते हैं। लेकिन आपकी शुभभावना सिर्फ शुभ नहीं, शक्तिशाली भी है क्योंकि आप संगमयुगी श्रेष्ठ आत्माएं हो, संगमयुग को ड्रामा अनुसार प्रत्यक्ष फल प्राप्त होने का वरदान है इसलिए आपकी भावना का प्रत्यक्ष फल आत्माओं को प्राप्त होता है। जो भी आत्माएं आपके सम्बन्ध-सम्पर्क में आती हैं, वह उसी समय ही शान्ति वा स्नेह के फल की अनुभूति करती हैं।

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बच्चों के मन का डर कैसे किया जाए खत्म?

''वहॉं अन्धेरा है, वहॉं जाने में डर लगता है।''- यह वह पाठ है, जिसे बच्चे रात को प्राय; घर-घर दुहराते हैं। मातायें सोचती हैं-''क्या किया जाये। बच्चे तो डरते ही हैं, न मालूम किससे।''

इस सम्बन्ध में एक मनोवैज्ञानिक की डायरी के पृष्ठों में कितनी ही महत्वपूर्ण बातों का उल्लेख हुआ है। पहली बात तो समझ लेने की यह है कि भय एक प्रकार की छाया है, जो बालक के मस्तिष्क पर पड़ जाती है और जिसे दूर किया जा सकता है। यह भय साधारण बात नहीं है और उसकी उसके व्यक्तित्त्व की कमजोरी का पूर्व-चिन्ह है और उसकी मानसिक स्वास्थ्य हीनता को बतलाता है। माता पिता को कोई ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए, जिससे बालक का डर अधिक हो, अगर उसे अंधेरे से डर लगता हो, उसे हौआ से डराने के लिए या किसी बात की सजा देने के लिए कभी अंधेरे कमरे में बंद नहीं करना चाहिए। छोटे बच्चों को भयभीत करने का कोई भी कारण उचित नहीं माना जा सकता।