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जानें! श्राद्ध में उपयोग की जाने वाली वस्तुओं का अध्यात्म शास्त्रीय महत्त्व

श्राद्ध में दर्भ (कुश), काला तिल, अक्षत, तुलसी, भृंगराज (भंगरैया) आदि वस्तुओं का उपयोग किया जाता है। क्या आप जानते हैं कि क्यों?

1. दर्भ के बिना श्राद्धकर्म नहीं किया जाता?
2. श्राद्ध करते समय देवता एवं पितरों के स्थानों पर बैठने के लिए यदि ब्राह्मण न मिलें, तब उन स्थानों पर दर्भ रखा जाता है?
3. श्राद्धकर्म में काले तिल का उपयोग किया जाता है?
4. श्राद्ध में चावल की ही खीर बनाई जाती है?
5. भृंगराज एवं तुलसी के उपयोग से वायुमंडल शुद्ध होकर पितरों के लिए श्राद्धस्थल पर आना सुगम होता है?

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‘कोरोना’ महामारी की पार्श्‍वभूमि पर शास्त्रोक्त पद्धति से पितृपक्ष में महालय श्राद्धविधि कैसे करें?

‘भाद्रपद कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से भाद्रपद अमावस्या (विक्रम संवत के अनुसार शुद्ध अश्‍विन अमावस्या) (२ से १७ सितंबर २०२०) की अवधि में पितृपक्ष है । ‘सभी पूर्वज संतुष्ट हों और साधना के लिए उनके आशीर्वाद मिलें’, इस हेतु हिन्दू धर्मशास्त्र में पितृपक्ष में सभी को महालय श्राद्ध करने को कहा है ।

पितृपक्ष में महालय श्राद्धविधि करने का महत्त्व ! : पितृपक्ष के काल में कुल के सभी पूर्वज अन्न एवं जल (पानी) की अपेक्षा लेकर अपने वंशजों के पास आते हैं । पितृपक्ष में पितृलोक के पृथ्वीलोक के सर्वाधिक निकट आने से इस काल में पूर्वजों को समर्पित अन्न, जल और पिंडदान उन तक शीघ्र पहुंचता है । उससे वे संतुष्ट होकर आशीर्वाद देते हैं । श्राद्धविधि करने से पितृदोष के कारण साधना में आनेवाली बाधाएं दूर होकर साधना में सहायता मिलती है ।  ऐसा है, परंतु वर्तमान में श्राद्धविधि कैसे करें, यह यक्ष प्रश्‍न लोगों के समक्ष है । उसी संदर्भ में यह लेखप्रपंच !

Pitru Paksha Visarjan

पितरों के प्रति श्रद्धा का प्रतीक होते हैं श्राद्ध, जानें इसका महत्त्व और विधि

ऐसा माना जाता है कि अगर पितृ खुश है तो ईश्वर की कृपा भी आप पर बनी रहेगी। पितरों को खुश करने के लिए हमें श्रद्धाभाव के साथ उनका तर्पण, पूजा, ब्रह्मभोज एवं दान करना चाहिए। इसी श्रद्धा का प्रतीक होते हैं श्राद्ध। इस वर्ष पितृपक्ष 2 सितंबर से शुरू हो रहे हैं। इस पखवाड़े में अपने पूर्वजों का श्राद्ध तर्पण किया जाता है। इसमें अपने पूर्वजों को याद करते हुए उनका आभार जताते हैं कि उनकी वजह से ही आज हम इस दुनिया में हैं। ऐसा माना गया है कि इस समयावधि के दौरान पितृ स्वर्गलोक, यमलोक, पितृलोक, देवलोक, चंद्रलोक व अन्य लोकों से सूक्ष्म वायु शरीर धारण कर धरती पर आते हैं। वे देखते हैं कि उनका श्राद्ध श्रद्धाभाव से किया जा रहा है या नहीं। अच्छे कर्म दिखने पर पितृ अपने वंशजों पर कृपा करते हैं। अगर कोई अपने पितरों का श्राद्ध नहीं करता या श्रद्धापूर्वक नहीं करता तो पितृ नाराज हो जाते हैं। इससे पितृ दोष लगता है।

Pitru Paksha

पितृऋण चुकाने के लिए श्रद्धापूर्वक ‘श्राद्धकर्म’ कर पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें!

धर्म कहता है कि देवऋण,ऋषिऋण, समाजऋण एवं पितृऋण चुकाना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है। पितृपक्ष में ‘पितृऋण’ चुकाने के लिए श्राद्धकर्म करना आवश्यक होता हैय परंतु वर्तमान में अनेक हिन्दुओं में धर्मशिक्षा का अभाव, तथाकथित बुद्धिजीवियों का अपप्रचार एवं हिन्दू धर्म को हीन समझने की प्रवृत्ति के कारण श्राद्धकर्म की उपेक्षा करने की मात्रा बढ़ती जा रही है। 

‘राजा भगीरथ’ द्वारा पूर्वजों की मुक्ति के लिए की गई कठोर तपश्चर्या, तथा त्रेतायुग में प्रभु रामचंद्र के काल से लेकर छत्रपति शिवाजी महाराज के काल में भी श्राद्धकर्म किए जाने का उल्लेख है। आज भी अनेक पश्चिमी देशों के हजारों लोग भारत के तीर्थक्षेत्रों में आकर उनके पूर्वजों को आगे की गति प्राप्त हो, इसलिए श्रद्धापूर्वक श्राद्धकर्म करते हैं। 

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1 सितंबर से शुरू हो रहे पितृपक्ष, जानें इसका महत्त्व और विधि...

ऐसा माना जाता है कि अगर पितृ खुश है तो ईश्वर की कृपा भी आप पर बनी रहेगी। पितरों को खुश करने के लिए हमें श्रद्धाभाव के साथ उनका तर्पण, पूजा, ब्रह्मभोज एवं दान करना चाहिए। इसी श्रद्धा का प्रतीक होते हैं श्राद्ध। इस वर्ष पितृपक्ष एक सितंबर से शुरू हो रहा है। इस पखवाड़े में अपने पूर्वजों का श्राद्ध तर्पण किया जाता है। इसमें अपने पूर्वजों को याद करते हुए उनका आभार जताते हैं कि उनकी वजह से ही आज हम इस दुनिया में हैं। ऐसा माना गया है कि इस समयावधि के दौरान पितृ स्वर्गलोक, यमलोक, पितृलोक, देवलोक, चंद्रलोक व अन्य लोकों से सूक्ष्म वायु शरीर धारण कर धरती पर आते हैं। वे देखते हैं कि उनका श्राद्ध श्रद्धाभाव से किया जा रहा है या नहीं। अच्छे कर्म दिखने पर पितृ अपने वंशजों पर कृपा करते हैं। अगर कोई अपने पितरों का श्राद्ध नहीं करता या श्रद्धापूर्वक नहीं करता तो पितृ नाराज हो जाते हैं। इससे पितृ दोष लगता है।