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आज है विश्वकर्मा पूजा, इस दिन को क्यों कहते हैं ‘अभियंता दिवस’, आईये जानते हैं...

भारतीय संस्कृति प्रकृति को ईश्वर मानती है। आधुनिक विज्ञान का कितना भी महिमामंडन करें, तब भी उसकी सीमा है। भारतीय तत्त्वज्ञान के अनुसार धर्म और विज्ञान परस्पर विरोधी नहीं हैं। प्राचीन भारतीय ऋषियों ने आत्म साक्षात्कार की प्रक्रिया द्वारा विज्ञान के सिद्धांत प्रगट किए। इसलिए भारत में शिल्प शास्त्र, अग्नियान शास्त्र, नौकानयन शास्त्र, चिकित्सा शास्त्र, गणित, खगोल शास्त्र आदि अनेक शास्त्र अत्यंत उन्नत थे, परंतु मुगल, अंग्रेज और विदेशी आक्रमणकारियों ने प्राचीन अमूल्य ग्रंथसंपदा नष्ट कर दी, अनेक बाते चुरा लीं, सहस्रों स्थान हडप लिए। स्वतंत्रता के पश्चात ‘मेकाले’ प्रणित शिक्षा व्यवस्था स्वीकार कर प्राचीन ज्ञान की उपेक्षा की गई। आगे चलकर खरा इतिहास और ज्ञान भारतियों तक नहीं पहुंचने दिया। इस प्राचीन भारतीय विज्ञान-तंत्रज्ञान परंपरा को पुनरुज्जीवित करने की आवश्यकता है, ऐसा प्रतिपादन हिन्दू जनजागृति समिति के राष्ट्रीय मार्गदर्शक सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी ने किया। 

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जानें! अतृप्त पूर्वजों से कष्ट के कारण तथा उससे रक्षा के उपाय

अतृप्त पूर्वजों के कारण होनेवाले कष्ट से रक्षा हेतु उपासना करें! वर्तमान काल में पूर्व की भांति कोई श्राद्ध-पक्ष इत्यादि नहीं करता और न ही साधना करता है। इसलिए अधिकतर सभी को पितृदोष (पूर्वजों की अतृप्ति के कारण कष्ट) होता है। आगे पितृदोष की संभावना है या वर्तमान में हो रहा कष्ट पितृदोष के कारण है, यह केवल उन्नत पुरुष ही बता सकते हैं। किसी उन्नत पुरुष से भेंट संभव न हो, तो यहां पितृदोष के कुछ लक्षण दिए हैं – विवाह न होना, पति-पत्नी में अनबन, गर्भधारण न होना, गर्भधारण होने पर गर्भपात हो जाना, संतान का समय से पूर्व जन्म होना, मंदबुद्धि अथवा विकलांग संतान होना, संतान की बचपन में ही मृत्यु हो जाना आदि। व्यसन, दरिद्रता, शारीरिक रोग, ऐसे लक्षण भी हो सकते हैं।  

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श्राद्ध में की जाने वाली विविध क्रियाओं का अध्यात्म शास्त्र

इस समयावधि के दौरान पितृ स्वर्गलोक, यमलोक, पितृलोक, देवलोक, चंद्रलोक व अन्य लोकों से सूक्ष्म वायु शरीर धारण कर धरती पर आते हैं। वे देखते हैं कि उनका श्राद्ध श्रद्धाभाव से किया जा रहा है या नहीं। अच्छे कर्म दिखने पर पितृ अपने वंशजों पर कृपा करते हैं। अगर कोई अपने पितरों का श्राद्ध नहीं करता या श्रद्धापूर्वक नहीं करता तो पितृ नाराज हो जाते हैं। इससे पितृ दोष लगता है। पितृपक्ष कौन से दिन किया जाए, कौन सी तिथि एवं नक्षत्र में किया जाए और उसके लाभ क्या हैं, बता रहे हैं गुरूराज प्रभु जी।  

1. देवकार्य में निषिद्ध मानी गई चांदी की वस्तुओं का उपयोग श्राद्ध में क्यों करना चाहिए?

पूजाकार्य में निषिद्ध मानी गई चांदी की वस्तुओं में रजोगुण एवं वायुतत्त्व होने के कारण पितर उनमें नैवेद्य शीघ्र ग्रहण कर सकते हैं, इसलिए चांदी की वस्तुओं का श्राद्ध में उपयोग किया जाता है ।

सौवर्णं राजतं वाऽपि पितृणां पात्रमुच्यते । - मत्स्यपुराण, अध्याय १७, श्‍लोक २०
अर्थ: पितरों से संबंधित विधियों के लिए सोना अथवा चांदी के पात्र का उपयोग करें ।

शिवनेत्रोद्भवं यस्मात् तस्मात् तत्पितृवल्लभम् । अमङ्गलं तद्यत्नेन देवकार्येषु वर्जयेत् ॥– मत्स्यपुराण, अध्याय १७, श्‍लोक २३
अर्थ : चांदी शंकर के तृतीय नेत्र से उत्पन्न हुई है । इसलिए वह पितृकार्य के लिए प्रशस्त (उत्तम) है; परंतु देवकार्य में वह अशुभ होती है । इसलिए इन कार्यों में चांदी के पात्र प्रयत्नपूर्वक वर्ज्य करें ।

अध्यात्मशास्त्रीय विश्‍लेषण १. ‘चांदी में सत्त्वगुण ५० प्रतिशत, रजोगुण ४० प्रतिशत एवं तमोगुण १० प्रतिशत है । चांदी में वायुतत्त्व भी अधिक मात्रा मेें है । इसलिए चांदी की वस्तुओं का उपयोग करते समय रजोगुण की वृद्धि होने से पितर चांदी के पात्र में रखा नैवेद्य शीघ्र ग्रहण कर सकते हैं । इस प्रकार पितरों को चांदी का लाभ मिलता है; किंतु देवकार्य  करते समय रजोगुण की अधिकतायुक्त चांदी के उपकरणों का उपयोग करने पर देवकार्य से निर्मित सात्त्विकता का लाभ सभी को नहीं होता । इसलिए देवकार्य में चांदी का उपयोग न करें ।’

२. ‘अन्य धातुओं की अपेक्षा चांदी में इच्छाशक्तिरूपी तरंगें आकृष्ट और धारण करने का गुण अधिक होता है । चांदी के सर्व ओर स्थित नादमय मंडल, इच्छातरंगों से प्रभारित रहता है ।

अ. चांदी के उपर्युक्त मंडल की नादतरंगों और पितरों के सूक्ष्म शरीर से प्रक्षेपित होनेवाली तरंगों की रचना में पर्याप्त समानता होने के कारण, लिंगदेह से निकलनेवाली तरंगें तथा कुछ मात्रा में यमतरंगें भी चांदी की ओर आकर्षित होती हैं । इसलिए कहा जाता है कि ‘पितरों को चांदी परमप्रिय है ।’

आ. चांदी के उपयोग से श्राद्धस्थल पर इच्छातरंगों तथा यमतरंगों से युक्त नादमंडल निर्मित होता है । इससे पितरों का श्राद्धस्थल पर आगमन सहजता से होता है ।

इ. चांदी में पृथ्वी एवं आप तत्त्व की तरंगें धारण करने की क्षमता अधिक होती है । पितरों के लिंगदेह में पृथ्वी एवं आप तत्त्व की मात्रा अधिक होती है । इसलिए, चांदी का उपयोग करने से पितरों पर श्राद्धकर्म की प्रत्येक क्रिया का प्रभाव अल्प समय में होता है ।

ई. जीव के स्थूल शरीर में पृथ्वी एवं आप तत्त्व की मात्रा अधिक होने के कारण चांदी के पात्र में भोजन करनेवाले सामान्य व्यक्ति को भी अल्प समय में भोजन की सूक्ष्म-वायु मिल जाती है ।

उ. चांदी धातु की सूक्ष्म संरचना तथा पितरों के विविध कोषों और मानव शरीर की सूक्ष्म संरचना में अधिक समानता होने के कारण मनुष्य तथा पितरों से संबंधित अनुष्ठानों में चांदी का अधिक उपयोग किया जाता है ।

ऊ. अपने रजोगुण के कारण चांदी देवकार्य में निषिद्ध मानी गई है ।’

(श्राद्ध में सोने अथवा चांदी से बनाए गए उपकरणों का प्रयोग कर सकते हैं । सोने के उपकरण महंगे होने के कारण वर्तमानकाल में सर्वसामान्य लोग सोने के उपकरणों का उपयोग नहीं कर पाते । अतः, यहां मुख्यरूप से चांदी संबंधी अध्यात्मशास्त्र दिया गया है । – संकलनकर्ता)

2. श्राद्ध में रंगोली के चूर्ण से रंगोली क्यों न बनाएं?

शुभकार्य में रंगोली बनाना शुभचिह्न का प्रतीक माना जाता है । रंगोली बनाना एक प्रकार से देवताओं से प्रक्षेपित सात्त्विक तरंगों का स्वागत कर उनका आवाहन करना है । रंगोली के माध्यम से हिन्दू धर्म हमें देवताओं की पूजा-अर्चना जैसी शुभविधि से प्रक्षेपित सात्त्विक तरंगों का स्वागत करने की सीख देता है । पितृकर्म करते हुए मर्त्यलोक से वातावरण की कक्षा में आनेवाले लिंगदेहों के माध्यम से वातावरण में रज- तमात्मक तरंगों का प्रक्षेपण होता रहता है । इसलिए इस रज-तमयुक्त अशुभ विधि के द्योतकस्वरूप यह कर्म करते समय रंगोली बनाना त्याज्य मानते हैं ।’

3. श्राद्ध में भस्म से रंगोली क्यों बनानी चाहिए?

श्राद्ध में भस्म से रंगोली बनाने पर, पितरों को अर्पित भोजन की अनिष्ट शक्तियों से रक्षा होती है । श्राद्धकर्म में भस्म से रंगोली बनाने पर उससे प्रक्षेपित होनेवाली तेजतत्त्वात्मक तरंगों से, पितरों को अर्पित हविर्भाग (अन्नपिंड) की, अनिष्ट शक्तियों के आक्रमण से रक्षा होती है और पितर प्रत्येक पिंड बिना बाधा के ग्रहण कर, थोडे ही समय में संतुष्ट हो जाते हैं ।

4. देवपूजा की क्रिया बाएं से दाएं तथा वही क्रिया श्राद्ध में दाएं से बाएं क्यों करना चाहिए?

देवकर्म में सर्व विधियां देवता का आवाहन करने के लिए होती हैं, जबकि पितृकर्म में प्रत्येक विधि पितरों का आवाहन करने के लिए की जाती है । इस दृष्टि से दर्भ की सहायता से उस विशिष्ट वस्तु पर जल छिडककर वैसा संकल्प किया जाता है । उन विशिष्ट तत्त्वों की तरंगों की गति के लिए पूरक दिशा में कर्म करने से, उसकी फलप्राप्ति अधिक होती है । देवकर्म करते समय देवताओं का आवाहन करने पर, ब्रह्मांड में कार्यरत उन विशिष्ट देवताओं की तरंगों का देवयान मार्ग से पृथ्वीकक्षा में आगमन होता है । सात्त्विक चैतन्यमय तरंगों का भ्रमण सदा दक्षिणावर्त दिशा में, अर्थात सीधी दिशा में होने के कारण देवकर्म करते समय सदा जल की सहायता से सीधा मंडल बनाकर अथवा सीधी परिक्रमा कर उन विशिष्ट देवताओं की तरंगों का आवाहनात्मक स्वागत किया जाता है । इसे ही ‘प्रदक्षिण कर्म’ कहते हैं । इसके विपरीत पितृयान से पृथ्वी की कक्षा में आगमन करनेवाले पितर, वामवर्त दिशा में (घडी की सुइयों की विपरीत दिशा में) कार्यरत रज-तमात्मक तरंगों की सहायता से श्राद्धस्थल पर आगमन करते हैं । इसलिए विशिष्ट पिंड पर अथवा पितरों से संबंधित सामग्री पर विपरीत दिशा में जल का मंडल बनाकर अथवा जल छिडक कर और संकल्प कर, विशिष्ट दिशा के लिए पूरक कर्म किया जाता है । इसे ही ‘अप्रदक्षिण कर्म’ कहते हैं ।’

5. श्राद्ध के समय ब्राह्मण देवस्थान के पूर्वाभिमुख एवं पितृस्थान के उत्तराभिमुख बैठने का अध्यात्मशास्त्रीय आधार क्या है?

श्राद्ध के समय ब्राह्मण देवस्थान के पूर्वाभिमुख बैठने से तथा पितृस्थान के उत्तराभिमुख बैठने से श्राद्ध की फलोत्पत्ति अधिक होती है । ‘पूर्व-पश्‍चिम दिशा में क्रियातरंगें घनीभूत होती हैं । (ज्ञानतरंगें, इच्छातरंगें एवं क्रियातरंगें ब्रह्मांड की तीन प्रमुख तरंगें हैं । – संकलनकर्ता) श्राद्ध के मंत्रोच्चारण से इन तरंगों को गति प्राप्त होती है । इस दिशा की ओर मुख कर बैठनेवाले ब्राह्मणों द्वारा किया गया कर्म उस विशिष्ट दिशा की ओर आकर्षित देवताओं की सात्त्विक तरंगों के कारण शीघ्र ही संकल्प सिद्ध होने से फलोत्पत्ति भी अधिक होती है । पृथ्वीकक्षा में पितरों के आगमन के लिए यमतरंगों का प्रवाह पोषक होता है । अन्य दिशाओं की अपेक्षा उत्तर- दक्षिण दिशा में तिर्यक तरंगें, तथा यमतरंगों का संक्रमण अधिक होने के कारण पितृस्थान पर बैठे ब्राह्मणों को दिया गया दान अल्पावधि में पूर्णत्व प्राप्त करता है । इसलिए देवस्थान के ब्राह्मण पूर्वाभिमुख एवं पितृस्थान के ब्राह्मण उत्तराभिमुख बैठते हैं । इस प्रकार उस विशिष्ट दिशा में घनीभूत हुई तरंगों का उस विशिष्ट कर्म से अधिकाधिक फलप्राप्ति हेतु उपयोग किया जाता है।’

6. श्राद्ध के लिए एक ही ब्राह्मण मिलने पर उसे पितृस्थान पर बिठाकर देवस्थान पर शालग्राम अथवा बालकृष्ण क्यों रखें?

‘मारक प्रकार की गोल तरंगें प्रक्षेपित करना शालग्राम की एवं क्रियादर्शक गोल तरंगें प्रक्षेपित करना बालकृष्ण मूर्ति की विशेषता है । देवस्थानों में शालग्राम की स्थापना से, वहां किए जानेवाले श्राद्धादि कर्मों में अनिष्ट शक्तियां अत्यल्प बाधा डाल पाती हैं और बालकृष्णरूप की स्थापना से पितर तरंगों को आगे जाने में सहायता मिलती है । गोलाकार तरंगोें में आकर्षण शक्ति अधिक होती है । अतः किसी भी घटक को आकर्षित तथा बद्ध कर उन्हें विशिष्ट स्तर पर विघटित करने की अथवा कार्यानुसार उनके वेग में परिवर्तन कर उन्हें गति देने की क्षमता मूलतः ही वलयांकित तरंगों में अधिक होती है । इसलिए यह उस स्तर की तरंगों के प्रक्षेपण से विशिष्ट स्थान पर देवताओं की विशेषता के उपयोग का एक श्रेष्ठ उदाहरण

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जानें! श्राद्ध करने हेतु वार, तिथि, नक्षत्र एवं उसके लाभ

पितृपक्ष शुरू हो चुके हैं। इस पखवाड़े में अपने पूर्वजों का श्राद्ध तर्पण किया जाता है। इसमें अपने पूर्वजों को याद करते हुए उनका आभार जताते हैं कि उनकी वजह से ही आज हम इस दुनिया में हैं। ऐसा माना गया है कि इस समयावधि के दौरान पितृ स्वर्गलोक, यमलोक, पितृलोक, देवलोक, चंद्रलोक व अन्य लोकों से सूक्ष्म वायु शरीर धारण कर धरती पर आते हैं। वे देखते हैं कि उनका श्राद्ध श्रद्धाभाव से किया जा रहा है या नहीं। अच्छे कर्म दिखने पर पितृ अपने वंशजों पर कृपा करते हैं। अगर कोई अपने पितरों का श्राद्ध नहीं करता या श्रद्धापूर्वक नहीं करता तो पितृ नाराज हो जाते हैं। इससे पितृ दोष लगता है। पितृपक्ष कौन से दिन किया जाए, कौन सी तिथि एवं नक्षत्र में किया जाए और उसके लाभ क्या हैं, बता रहे हैं गुरूराज प्रभु जी।  

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पितरों का ‘वार्षिक श्राद्ध’ और पितृपक्ष में 'महालय श्राद्ध' दोनों क्यों करना चाहिए?

ऐसा माना गया है कि इस समयावधि के दौरान पितृ स्वर्गलोक, यमलोक, पितृलोक, देवलोक, चंद्रलोक व अन्य लोकों से सूक्ष्म वायु शरीर धारण कर धरती पर आते हैं। वे देखते हैं कि उनका श्राद्ध श्रद्धाभाव से किया जा रहा है या नहीं। अच्छे कर्म दिखने पर पितृ अपने वंशजों पर कृपा करते हैं। अगर कोई अपने पितरों का श्राद्ध नहीं करता या श्रद्धापूर्वक नहीं करता तो पितृ नाराज हो जाते हैं। इससे पितृ दोष लगता है।