Navratra Thali

जनिये! नवरात्र में व्रत के दौरान कैसे रखें अपने को फिट

नवरात्र शुरू हो गये हैं। ऐसे में लोग देवी माँ का आर्शीवाद पाने के लिए 9 दिन का का कठिन व्रत लेते हैं। लेकिन, उनके मन में हमेशा शंका बनी रहती हैं कि व्रत में ऐसा क्या खायें कि पूरे दिन देवी माँ की भक्ति के लिए ऊर्जा मिलती रहे। ऐसे में आजकल बाजार में तरह-तरह का खाने का सामान उपलब्ध है और घर पर भी कई तरह के पकवान बनाये जा सकते हैं। नवरात्र में भक्तो को अपने शरीर के अनुसार ही व्रत करना चाहिए। इसलिए अगर आप 9 दिन तक उपवास नहीं रख सकते तो पहले और आखिरी नवरात्र को व्रत रख सकते हैं। लेकिन व्रत कोई भी हो सावधानी बरतना भी जरूरी है। आज हम आपको बता रहें है कि व्रत में कैसे सावधानी बरती जाए, ताकि आपको व्रत में शक्ति भी मिले और आपका उद्देश्य भी पूरा हो जाए। 

ऊर्जा के लिए लें फाइबर युक्त भोजन
व्रत के दौरान हमेशा फाइबर युक्त भोजन ही करें। व्रत के दौरान आप हमेशा ऐसा भोजन लें जो फाइबर से भरपूर हो और आसानी से पच जाए। ऐसा करने से आपको लम्बे समय तक ऊर्जा मिलेगी और आप अच्छा महसूस करेंगे। व्रत के खाने में आप कुट्टु का आटा, सिंघाड़ा, साबूदाना की खीर अथवा खिचड़ी और आलू आदि शामिल करें।

अच्छी नींद है जरूरी
जब भी आप व्रत रखें नींद पूरी लें। क्योंकि व्रत के दौरान हमारा शरीर डिटॉक्स से गुजर रहा होता है, ऐसे में हमें आराम की जरूरत होती है। इसलिए आप रोज 7 से 8 घंटे की नींद अवश्य लें। साथ ही अपने शरीर को पूरी तरह से डिटॉक्सिफाई करने के लिए योग और हल्की एक्सरसाइज भी कर सकती हैं।

तरल पदार्थ ज्यादा मात्रा लें
नवरात्र में अगर आप व्रत रखते हैं तो आपको डिहाइड्रेशन से बचना होगा। व्रत के दौरान अपने शरीर में तरल की मात्रा को कम नहीं होने देना है। इसलिए खूब पानी पीने पियें और साथ ही आप अन्य प्रकार के तरल भी ले सकते हैं। पानी के अलावा आप नारियल पानी, दूध, लस्सी और ताजे फलों का रस भी ले सकती हैं जो न केवल थकान से बचाएगा बल्कि रोगों से भी दूर रखेगा। 

व्रत में ज्यादा न खायें
व्रत के दौरान भूख ज्यादा लगती है। इस कारण लोग ज्यादा खा जाते हैं, जो शरीर के लिए नुकसानदेह हो सकता है। इसलिए ज्यादा खाने से पहले एक बार जरूर सोचें। व्रत के दौरान ज्यादा खाना आपके पाचन तंत्र को प्रभावित कर सकता है। इसलिए आप चिकने और तले हुए भोजन से दूर रहें और खाने में ताजे फल और सब्जियों का इस्तेमाल करें। 

हेल्दी स्नैक्स को प्राथमिकता दें
व्रत में फलाहार के साथ स्नैक्स खाने की इच्छा होती है, लेकिन इसके लिए आप बाजार के बने हुए आलू के चिप्स न खाएं। इसके लिए आप घर पर ही मखाने और मूंगफली भून कर रख सकते हैं और जब भी आपका मन स्नैक्स खाने का करे तो इसे इस्तेमाल कर सकते हैं। मखाना विटामिन डी का अच्छा स्रोत होता है। 

आहार में ज्यादा मीठा न लें
व्रत के दौरान मीठे खाने की तीव्र इच्छा होती है। बाजार में व्रत में खाने के लिए मीठे की बहुत वैरायटी उपलब्ध होती है। ये जितने भी पैक्ड स्नैक्स होते हैं उनमें प्रोसेस्ड चीनी और रिफाइंड का इस्तेमाल होता है, जो आपकी सेहत खराब कर सकता है। इसलिए अगर व्रत के दौरान कुछ मीठा खाने की इच्छा करे तो घर पर बने मीठे का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके लिए घर पर ही आप घीये की बर्फी बना सकते है, जो खाने में स्वादिष्ट भी होगी और सेहत के लिए भी अच्छी 

इन बातों का भी रखें ध्यान:
घर में बना भोजन ही खाएं
पानी और दूसरे तरह की लिक्विड लगातार लेते रहें
उपवास के दौरान डेयरी प्रोडक्ट का करें इस्तेमाल 
मौसमी फल आहार में करें शामिल
एक साथ ज्यादा पानी पीने के बजाए, थोड़े अंतराल पर पानी पीते रहें
सिंघाड़े और कुट्टू के आटे से बनी हुई चीजें करें इस्तेमाल
पानी में नींबू और शहद मिलाकर पियें, इससे भूख को कंट्रोल करने में मदद मिलेगी

Ghatsthapana

जानिये! नवरात्रि में घटस्थापना का अध्यात्मशास्त्र एवं उसका महत्त्व

शक्ति उपासना का पर्व शारदीय नवरात्रि 17 अक्तूबर, शनिवार से आरंभ होने जा रहा है। अश्विन माह की प्रतिपदा तिथि से लेकर नवमी तिथि तक देवी के 9 अलग-अलग स्वरूपों की पूजा-आराधना की जाएगी। अनेक परिवारों में यह व्रत कुलाचार के स्वरूप में किया जाता है। आश्विन की शुक्ल प्रतिपदा से इस व्रत का प्रारंभ होता है। आज हम आपको बतायेंगे की नवरात्रि पर घटस्थापना कैसे की जाती है और उसका क्या महत्त्व हैः-

Navratri

जानिए, नवरात्रि के अन्य दिनों का आध्यात्मिक महत्त्व और पूजा विधि

नवरात्रि के नौ दिनों में घटस्थापना के उपरांत पंचमी, षष्ठी, अष्टमी एवं नवमी का विशेष महत्त्व है । पंचमी के दिन देवी के नौ रूपों में से एक श्री ललिता देवी अर्थात महात्रिपुरसुंदरी का व्रत होता है । शुक्ल अष्टमी एवं नवमी ये महातिथियां हैं । इन तिथियोंपर चंडीहोम करते हैं । नवमीपर चंडीहोम के साथ बलि समर्पण करते हैं ।

Navratri

जानिए, क्यों मनाई जाती है नवरात्रि और क्या है इसका अध्यात्मशास्त्रीय महत्त्व...

शक्ति उपासना का पर्व शारदीय नवरात्रि 17 अक्तूबर, शनिवार से आरंभ होने जा रहा है। अश्विन माह की प्रतिपदा तिथि से लेकर नवमी तिथि तक देवी के 9 अलग-अलग स्वरूपों की पूजा-आराधना की जाएगी। 9 दिन के लिए माता दुर्गा पृथ्वी पर आती है और अपने भक्तों की साधना से प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद प्रदान करती है। नवरात्रि के पहले 3 दिन देवी दुर्गा के ऊर्जा और शक्ति की उपासना का महत्व होता है। फिर नवरात्रि के चौथे, पांचवें और छठे दिन पर सुख और समृद्धि प्रदान करने वाले देवी लक्ष्मी, सातवें दिन कला और ज्ञान की देवी सरस्वती की उपासना होती है। अष्टमी और नवमी तिथि पर कन्या पूजन कर माता की विदाई की जाती है। नवरात्रि पर देवी दुर्गा की उपासना करने और शुभ फल प्राप्त करने के लिए शास्त्रों में कई उपाय बताए गए हैं। इन उपायों को करने से देवी मां बहुत जल्दी प्रसन्न होती हैं। आइए जानते हैं क्यों मनाई जाती है नवरात्रि इसका महत्त्व और देवी के रूपों के बारे में...

Lord Vishnu Lakshmi

जानें! ‘पुरुषोत्तम मास’ का महत्त्व, इसमें किए जाने वाले व्रत, पुण्यकारक कृत्य व इनके अध्यात्मशास्त्र

इस वर्ष 18.9.2020 से 16.10.2020 की अवधि में अधिक मास है। यह अधिक मास ‘आाश्विन अधिक मास’ है। अधिक मास को अगले मास का नाम दिया जाता है, उदा। आाश्विन मास से पूर्व आनेवाले अधिक मास को ‘आाश्विन अधिक मास’ कहते हैं और उसके उपरांत आने वाले मास को ‘शुद्ध आाश्विन मास’ कहा जाता है। अधिक मास किसी बडे पर्व की भांति होता है। इसलिए इस मास में धार्मिक कृत्य किए जाते हैं और ‘अधिक मास महिमा’ ग्रंथ का वाचन किया जाता है।

1. अधिक मास या मलमास क्या होता है?

अ. चांद्रमास रू सूर्य एवं चंद्र का एक बार मिलाप होने के समय से लेकर अर्थात एक अमावस्या से लेकर पुनः इस प्रकार मिलाप होने तक अर्थात अगले मास की अमावस्या तक का समय ‘चांद्रमास’ होता है । त्योहार, उत्सव, व्रत, उपासना, हवन, शांति, विवाह आदि हिन्दू धर्मशास्त्र के सभी कृत्य चांद्रमास के अनुसार (चंद्रमा की गति पर) सुनिाश्चित होते हैं। चांद्रमासों के नाम उस मास में आनेवाली पूर्णिमा के नक्षत्रों के आधार पर पडे हैं, उदा. चैत्र मास की पूर्णिमा के दिन चित्रा नक्षत्र होता है ।

आ. सौरवर्षः ऋतु सौरमास के अनुसार (सूर्य की गति पर) सुनिश्चित हुए हैं । सूर्य आश्विनी नक्षत्र से लेकर भ्रमण करते हुए पुनः उसी स्थान पर आता है । उतने समय को ‘सौरवर्ष’ कहा जाता है ।

इ. ‘चांद्रवर्ष और सौरवर्ष का मेल हो’य इसके लिए अधिक मास का प्रयोजन! चांद्रवर्ष के 354 दिन और सौरवर्ष के 365 दिन होते हैं, अर्थात इन 2 वर्षों में 11 दिनों का अंतर होता है। ‘इस अंतर की भरपाई हो’, साथ ही चांद्रवर्ष और सौरवर्ष का मेल होय इसके लिए स्थूल  लगभग 32.5 (साढे बत्तीस) मास के पश्चात एक अधिक मास लिया जाता है अर्थात 27 से 35 मास के पश्चात 1 अधिक मास आता है ।

2. अधिक मास के अन्य नाम

अधिक मास को ‘मलमास’ भी कहते हैं। अधिक मास में मंगल कार्य की अपेक्षा विशेष व्रत और पुण्यकारी कृत्य किए जाते हैं, इसलिए इसे ‘पुरुषोत्तम मास’ भी कहते हैं ।

3. अधिक मास किस माह में आता है?

अ. चैत्र से आाश्विन इन 7 मासों में से एक मास ‘अधिकमास’ के रूप में आता है।

आ. कभी-कभी फाल्गुन मास भी ‘अधिक मास’ के रूप में आता है ।

इ. कार्तिक, मार्गशीर्ष और पौष, इन मासों से जोडकर अधिक मास नहीं आता। इन 3 मासों में से कोई भी एक मास क्षय मास हो सकता हैय क्योंकि इन 3 मासों में सूर्य की गति अधिक होने के कारण एक चांद्रमास में उसके 2 संक्रमण हो सकते हैं। जब क्षय मास आता है, तब एक वर्ष में क्षय मास से पूर्व 1 और उसके उपरांत 2 ऐसे अधिक मास निकट-निकट आते हैं।

ई. माघ मास अधिक अथवा क्षय मास नहीं हो सकता ।

4. अधिक मास में व्रत और पुण्यकारी कृत्य करने का अध्यात्मशास्त्र

प्रत्येक मास में सूर्य एक-एक राशि में संक्रमण करता है, परंतु अधिक मास में सूर्य किसी भी राशि में संक्रमण नहीं करता अर्थात अधिक मास में सूर्य संक्रांति नहीं होती । इस कारण चंद्र और सूर्य की गति में अंतर पडता है और वातावरण में भी ग्रहणकाल की भांति बदलाव आते हैं। ‘इस बदलते अनिष्ट वातावरण का अपने स्वास्थ्य पर परिणाम नहोय इसलिए इस मास में व्रत और पुण्यकारी कृत्य करने चाहिए’, ऐसा शास्त्रकारों ने बताया है।

5. अधिक मास में किए जानेवाले व्रत तथा पुण्यकारी कृत्य

अ. अधिक मास में श्री पुरुषोत्तम प्रीत्यर्थ 1 मास उपवास, आयाचित भोजन (अकस्मात किसी के घर भोजन के लिए जाना), नक्त भोजन (दिन में भोजन न कर रात के पहले प्रहर में एक बार ही भोजन करना) भोजन करना चाहिए अथवा एकभुक्त रहना चाहिए। (दिन में एक बार ही भोजन करना) दुर्बल व्यक्ति, इन 4 प्रकारों में से न्यूनतम एक प्रकार का न्यूनतम 3 दिन अथवा एक दिन तो आचरण करे ।

आ. प्रतिदिन एक ही बार भोजन करना चाहिए। भोजन करते समय बोलना नहीं चाहिए, उससे आत्मबल बढता है। मौन रहकर भोजन करने से पापक्षालन होता है।

इ. तीर्थस्नान करना चाहिए। न्यूनतम एक दिन गंगास्नान करने से सभी पापों की निवृत्ति हो जाती है।

ई. ‘इस पूरे मास में दान देना संभव न हो, तो उसे शुक्ल एवं कृष्ण द्वादशी, पूर्णिमा, कृष्ण अष्टमी,नवमी, चतुर्दशी, अमावस्या, इन तिथियों को तथा व्यतिपात और वैधृति, इन योगों के दिन विशेष दानधर्म करना चाहिए’, ऐसा शास्त्र में बताया गया है।

उ. इस मास में प्रतिदिन श्री पुरुषोत्तम कृष्ण की पूजा और नामजप कर अखंड आंतरिक सान्निध्य में रहने का प्रयास करना चाहिए।

ऊ. दीपदान करना चाहिए। भगवान के सामने अखंड दीप जलाने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।

ए. तीर्थयात्रा और देवतादर्शन करने चाहिए।

ऐ. तांबूल दान करना चाहिए। एक मास तांबूल दान करनेसे सौभाग्य की प्राप्ति होती है ।

ओ. गोपूजन कर गोग्रास देना चाहिए।

औ. अपूपदान (अनरसों का) दान देना चाहिए।

6. अधिक मास में कौन से कार्य करने चाहिए?
इस मास में नित्य एवं नैमित्तिक कर्म करने चाहिए अर्थात जिन कर्मों को किए बिना कोई विकल्प नहीं है, ऐसे कर्म करने चाहिए। अधिकमास में निरंतर नामस्मरण करने से श्री पुरुषोत्तमकृष्ण प्रसन्न होते हैं।

अ. ज्वरशांति, पर्जन्योष्टि आदि सामान्य कर्म करने चाहिए।

आ. इस मास में देवता की पुनः प्रतिष्ठा की जा सकती है।

इ. ग्रहणश्राद्ध, जातकर्म, नामकर्म, अन्नप्राशन आदि संस्कार करें।

ई. मन्वादि एवं युगादि से संबंधित श्राद्धादि कृत्य करने चाहिए, साथ ही तीर्थश्राद्ध, दर्शश्राद्ध और नित्यश्राद्ध करने चाहिए ।

7. अधिक मास में कौन से कार्य नहीं करने चाहिए? 
सामान्य काम्य कर्मों को छोडकर अन्य काम्यकर्मों का आरंभ और समाप्ति नहीं करनी चाहिए । महादान (बहुत बडे दान), अपूर्व देवतादर्शन (पहले कभी नहीं गए ऐसे स्थान पर देवता के दर्शन के लिए जाना), गृहारंभ, वास्तुशांति, संन्यासग्रहण, नूतनव्रत ग्रहणदीक्षा, विवाह, उपनयन, चैल, देवता-प्रतिष्ठा आदि कृत्य नहीं करने चाहिए ।

8. अधिक मास में जन्मदिवस हो, तो क्या करना चाहिए? 
किसी व्यक्ति का जन्म जिस मास में हुआ है, वही मास यदि अधिकमास के रूप में आता है, तो उस व्यक्ति का जन्मदिवस शुद्ध मास में मनाएं, उदा. वर्ष 2019 के आश्विन मास में जन्मे बालक का जन्मदिवस इस वर्ष का अधिक मास आश्विन होने के कारण उसे अधिक मास में न मनाकर शुद्ध आश्विन मास में मनाएं।
इस वर्ष अधिक आश्विन मास में जिस बालक का जन्म होगा, उस बालक का जन्मदिन प्रतिवर्ष आश्विन मास की उस तिथि पर मनाएं।

9. अधिक मास होने पर श्राद्ध कब करना चाहिए? 
‘जिस मास में व्यक्ति का निधन हुआ हो, उसका वर्षश्राद्ध उसी मास के अधिक मास में आता हो, तब उस अधिक मास में ही उसका श्राद्ध करें, उदा. वर्ष 2019 के  आश्विन मास में व्यक्ति का निधन हुआ हो, तो उस व्यक्ति का वर्ष श्राद्ध इस वर्ष के अधिक आश्विन मास में उस तिथि को करें।

अ. शक 1941 के (अर्थात पिछले वर्ष के) आश्विन मास में किसी की मृत्यु हुई हो, तो उसका प्रथम वर्षश्राद्ध शक 1942 के (इस वर्ष के) अधिक आश्विन मास में उस तिथि को करें।

आ. प्रतिवर्ष के आश्विन मास का प्रतिसांवत्सरिक श्राद्ध इस वर्ष के शुद्ध आश्विन मास में करेंय परंतु पहले के अधिक आश्विन मास में मृत्यु हुए व्यक्तियों का प्रति सांवत्सरिक श्राद्ध इस वर्ष के अधिक आश्विन मास में करें।

इ. पिछले वर्ष (शक 1941 में) कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष इत्यादि महीनों में मृतलोगों का प्रथम वर्षश्राद्ध संबंधित मास की उनकी तिथि पर करें। १3 मास होते हैं, इसलिए 1 मास पहले न करें ।

ई. इस वर्ष अधिक आश्विन अथवा शुद्ध आश्विन मास में मृत्यु होने पर उनका प्रथम वर्षश्राद्ध अगले वर्ष के आश्विन मास में उस तिथि पर करें।

(संदर्भ: धर्मसिंधु - मलमास निर्णय, वर्ज्य-अवर्ज्य कर्म विभाग)’ (संदर्भ: दाते पंचांग)

10. अधिक मास निकालने की पद्धति

अ. जिस मास की कृष्ण पंचमी के दिन सूर्य की संक्रांति आएगी, अगले वर्ष प्रायः वही अधिक मास होता हैय परंतु यह स्थूल रूप में (सर्वसामान्य) है।

आ. शालिवाहन शक को 12 से गुणा करें और उस गुणांकको 19 से भाग दें। जो शेष रहेगा, वह संख्या 9 अथवा उससे न्यून हो, तो उस वर्ष अधिक मास आएगा, यह जान लें।

 इ. एक और पद्धति (अधिक विश्वसनीय): विक्रमसंवत् की संख्या में 24 मिलाकर उस जोड को 160 से भाग दें।

1. शेष 30, 49, 68, 87, 106, 125, इनमें से कोई शेष रही, तो चैत्र
2. शेष 11, 76, 85, 114, 133, 152, इनमें से कोई शेष रही, तो वैशाख
3. शेष 0, 8, 19, 27, 38, 46, 57, 65, 84, 103, 122, 141, 149 इनमें से कोई शेष रही, तो ज्येष्ठ
4. शेष 16, 35, 54, 73, 82, 111, 130, 157, इनमें से कोई शेष रही, तो आषाढ
5. शेष 5, 24, 46, 62, 70, 81, 82, 89, 100, 108, 119, 127, 138, 145, इनमें से कोई शेष रही, तो श्रावण
6. शेष 13, 32, 51 में से कोई शेष रही, तो भाद्रपद तथा
7. शेष 2, 21, 40, 59, 78, 97, 135, 143, 145 में से कोई शेष रही, तो आश्विन मास अधिक मास होता है।
8. अन्य कोई संख्या शेष रही, तो अधिक मास नहीं आता।

उदा. इस वर्ष विक्रम संवत् 2077 चल रहा है, इसलिए 207724 = 2101

2101 को 160 से भाग देने पर शेष 21 रह जाता है, इसलिए शेष 21 आने से आश्विन मास अधिक मास है ।

11. आनेवाले अधिक मासों की सारणी
शालिवाहन शक  अधिक मास  

1942                       आश्विन
1945                        श्रावण
1948                        ज्येष्ठ  
1951                         चैत्र  
1953                        भाद्रपद
1956                        आषाढ
1959                         ज्येष्ठ
1961                        आश्विन