जानें कैसे करें कंजक पूजन, क्या है इसका शास्त्रीय आधार, महत्त्व एवं नियम

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नवरात्रि के 9 दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग 9 स्वरूपों की भक्त आराधना करते हैं। भक्त मां दुर्गा की विशेष कृपा पाने के लिए इन 9 दिनों का व्रत रखते हैं। व्रत के दौरान अष्टमी यानी कि व्रत के आठवें दिन 9 कन्याओं का पूजन करने का विधान है। वैसे कुछ लोग नवमीं भी पूजते हैं। अष्टमी और नवमीं को कुमारिकाओं की पूजा कर उन्हें शुद्ध घी का बना भोजन करवाएं। सुहागिन अर्थात प्रकट शक्ति व कुमारिका अर्थात अप्रकट शक्ति। प्रकट शक्ति का कुछ अपव्यय हो जाता है, अतएव सुहागिनों की अपेक्षा कुमारिकाओं में कुल शक्ति अधिक होती है। इसलिए कुमारिकाओं की ही कंजक पूजन के दिन पूजा की जाती है।

कुमारिका-पूजन (कंजक पूजन) कैसे करें?
1. नवरात्रि के नौ दिन, आगे दिए अनुसार प्रतिदिन कुमारिकाओं को सम्मानपूर्वक घर पर बुलाएं। ‘नवरात्रि’ में किसी भी एक दिन ‘नौ’ की विषम संख्या में कुमारिकाओं को बुलाने की भी प्रथा है।
2. कुमारिकाओं को बैठने के लिए आसन दें।
3. इस भाव का उनकी पाद्यपूजा करें कि, उनमें देवीतत्त्व जागृत हो गया है।
4. देवी को भानेवाला भोजन कुमारिकाओं के लिए केले के पत्ते पर परोसें। (देवी को खीर-पूरी भाती है।)
5. कुमारिकाओं को नए वस्त्र देकर उन्हें आदिशक्ति का रूप मानकर भावपूर्वक नमस्कार करें।’

कुमारिका-पूजन (कंजक पूजन) का शास्त्रीय आधार एवं महत्त्व
‘कुमारिका’ अप्रकट शक्तितत्त्व का प्रतीक है। इसलिए पूजा करने से उसमें विद्यमान शक्तितत्त्व जागृत होता है और उसकी ओर ब्रह्मांड की तेजतत्त्वात्मक तरंगें आकृष्ट होने में सहायता मिलती है। इसके उपरांत उसके द्वारा यह तत्त्व सहजता से वायुमंडल में प्रक्षेपित होता है, इसके कारण प्रत्यक्ष चेतनाजन्य माध्यम से शक्ति-तत्त्वात्मक तरंगों का लाभ पाने में सहायता मिलती है। नौ दिन कार्यरत देवीतत्त्व की तरंगोंका, अपनी देह में संवर्धन होने हेतु, भक्तिभाव से कुमारिका-पूजन कर उसे संतुष्ट किया जाता है। कुमारिका में संस्कारों के प्रकटीकरण भी न्यून होने के कारण, उससे देवीतत्त्व का अधिकाधिक सगुण लाभ पाना संभव होता है। इसलिए नवरात्रि में कुमारिका-पूजन का महत्त्व है।

नवरात्रि के अन्य दिनों का अध्यात्मशास्त्रीय महत्त्व
नवरात्रि के नौ दिनों में घटस्थापना के उपरांत पंचमी, षष्ठी, अष्टमी एवं नवमी का विशेष महत्त्व है। पंचमी के दिन देवी के नौ रूपों में से एक श्री ललिता देवी अर्थात महात्रिपुरसुंदरी का व्रत होता है। शुक्ल अष्टमी एवं नवमी ये महातिथियां हैं। इन तिथियोंपर चंडीहोम करते हैं। नवमीपर चंडीहोम के साथ बलि समर्पण करते हैं।

नवरात्रि की पंचमी पर ललितापूजन
नवरात्रि की कालावधि में पंचमी की तिथिपर ब्रह्मांड में शक्तितत्त्व की गंधतरंगें अधिक मात्रा में कार्यरत रहती हैं । शक्तितत्त्व की इस गंधतरंगों की गंधमयता को ‘ललिता’ के नाम से जानते हैं । यही कारण है कि, नवरात्रि के काल में आनेवाली पंचमी को ‘ललितापंचमी’ कहते हैं । पंचमी के दिन देवीपूजन करने से ब्रह्मांड में विद्यमान ये गंधतरंगें पूजास्थान की ओर आकृष्ट होती हैं । इन गंधतरंगों के कार्य के कारण पूजक के मनोमयकोष की शुद्धि होती है ।

नवरात्रि की षष्ठी तिथि का महत्त्व
षष्ठी के दिन देवी का विशेष पूजन किया जाता है और देवी की आंचलभराई भी की जाती है। इस काल में भक्त रातभर जागरण करते हैं, जिसे उत्तर भारत में जगराता भी कहते हैं। यह देवी की उपासना का एक अंग है। जिसमें देवीसंबंधी भजन-कीर्तन होता है। उसी प्रकार महाराष्ट्र में कुछ लोग ‘वाघ्या-मुरळी’के गीत एवं भारूड के नाम से प्रचलित संत एकनाथजी के भजन गाते हैं। इस जागरण को महाराष्ट्र में ‘गोंधळ’ कहते हैं। देवी की स्तुतिवाले भजन गाने के लिए विशेष लोगों को बुलाया जाता है। देवी का पूजन किया जाता है। लकडियों पर वस्त्र लपेटकर विशेष दीप बनाए जाते हैं। ऐसे दीप को ‘दिवटी’ कहते हैं। इन दीपों का पूजन कर प्रज्वलित करते हैं। विशेष तालवाद्य के साथ गीत गाते हैं।

नवरात्रि में जागरण करने का शास्त्रीय आधार
जागरण करना, यह देवी की कार्यस्वरूप ऊर्जा के प्रकटीकरण से संबंधित है। नवरात्रि की कालावधि में रात्रि के समय श्री दुर्गादेवी का तत्त्व इस कार्यस्वरूप ऊर्जा के बल पर इच्छा, क्रिया एवं ज्ञान शक्ति के माध्यम से व्यक्ति को कार्य करने के लिए बल प्रदान करता है। जागरण करने से उपवास के कारण सात्त्विक बने देहद्वारा व्यक्ति वातावरण में कार्यरत श्री दुर्गादेवी का तत्त्व इच्छा, क्रिया एवं ज्ञान इन तीनों स्तरोंपर सरलता से ग्रहण कर पाता है। परिणामस्वरूप उसके देह में विद्यमान कुंडलिनी के चक्रों की जागृति भी होती है। यह जागृति उसे साधनापथपर अग्रसर होने में सहायक सिद्ध होती है। यही कारण है कि, शास्त्रोंने नवरात्रिकी कालावधि में उपवास एवं जागरण करने का महत्त्व बताया है।

बंगाल में दुर्गापूजन में षष्ठी का विशेष पूजनविधि
बंगाल में शारदीय दुर्गापूजा दस दिन मनाते हैं। प्रतिपदा के दिन संध्याकाल में श्री दुर्गादेवी का आवाहन कर बेल के वृक्ष में उनकी स्थापना करते हैं। इसे ‘श्री दुर्गादेवी का अधिवास’ अथवा ‘छोटी बिल्लववरण’ कहते हैं। छठे दिन अर्थात षष्ठी तिथि को बेल के वृक्ष में उनका पूजन करते हैं। इस पूजन में देवी को विभिन्न प्रकार के फल, फूल, पत्र तथा अनाज अर्पण करते हैं। इस पूजन में बेल के फूलों का विशेषरूप से उपयोग करते हैं। इस पूजन को ‘बडी बिल्लववरण’ कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि, मां दुर्गा नवरात्रि के प्रथम दिन से षष्ठीतक बेल के वृक्ष में वास करती हैं अर्थात इस काल में शक्तितत्त्व बेल के वृक्ष में आकर्षित होकर संचयित रहता है। षष्ठी के दिन देवी का विशेष पूजन एवं अनुष्ठान करते हैं।

नवरात्रि की सप्तमी को देवीमां के कालरात्रि’ रूप का पूजन
सप्तमी के दिन देवीमां के दैत्य-दानव, भूत-प्रेत इत्यादि का नाश करनेवाले कालरात्रि’ नामक रूप का पूजन करते हैं। बंगाल में दुर्गापूजा की सप्तमीपर नदी अथवा किसी जलाशय से पांच कलशों में जल लाकर श्री गणेश, श्री महालक्ष्मी, कार्तिकेय, सरस्वती देवी तथा दुर्गादेवी के लिए घटस्थापना करते हैं। यहां उल्लेखनीय भाग यह है कि, इस दिन से केले के पेडकोध्तने को पीली साडी पहनाकर श्री गणेशजी की प्रतिमा के साथ रखते हैं और श्री गणेश की शक्ति के प्रतीक के रूप में उसका पूजन करते हैं।

दुर्गाष्टमी (महाष्टमी)
दुर्गाष्टमी के दिन देवी के अनेक अनुष्ठान करने का महत्त्व है। इसलिए इसे ‘महाष्टमी’ भी कहते हैं। अष्टमी एवं नवमी की तिथियों के संधिकाल में अर्थात अष्टमी तिथि पूर्ण होकर नवमी तिथि के आरंभ होने के बीच के काल में देवी शक्तिधारणा / शक्ति धारण करती हैं  इसीलिए इस समय श्री दुर्गाजी के ‘चामुंडा’ रूप का विशेष पूजन करते हैं, जिसे ‘संधिपूजन’ कहते हैं।

महाष्टमी के दिन बीजरूपी धारणा से सरस्वतीतत्त्व का ब्रह्मांड में तेजस्वी आगमन होता है। इसी को ‘सरस्वती तत्त्व का आवाहनकाल’ कहते हैं। इस काल में शक्ति का रूप प्रज्ञारूपी प्रगल्भता से संचारित रहता है। ये शक्ति की तारक रूप की तरंगें होती हैं  इस काल में सरस्वती की तारक तरंगों के स्पर्श से जीव की आत्मशक्ति जागृत होती है और वह प्रज्ञा में रूपांतरित होती है। इसलिए पूजक को आनंद की अनुभूति होती है।