आज है विश्वकर्मा पूजा, इस दिन को क्यों कहते हैं ‘अभियंता दिवस’, आईये जानते हैं...

VishwarkarPuja

भारतीय संस्कृति प्रकृति को ईश्वर मानती है। आधुनिक विज्ञान का कितना भी महिमामंडन करें, तब भी उसकी सीमा है। भारतीय तत्त्वज्ञान के अनुसार धर्म और विज्ञान परस्पर विरोधी नहीं हैं। प्राचीन भारतीय ऋषियों ने आत्म साक्षात्कार की प्रक्रिया द्वारा विज्ञान के सिद्धांत प्रगट किए। इसलिए भारत में शिल्प शास्त्र, अग्नियान शास्त्र, नौकानयन शास्त्र, चिकित्सा शास्त्र, गणित, खगोल शास्त्र आदि अनेक शास्त्र अत्यंत उन्नत थे, परंतु मुगल, अंग्रेज और विदेशी आक्रमणकारियों ने प्राचीन अमूल्य ग्रंथसंपदा नष्ट कर दी, अनेक बाते चुरा लीं, सहस्रों स्थान हडप लिए। स्वतंत्रता के पश्चात ‘मेकाले’ प्रणित शिक्षा व्यवस्था स्वीकार कर प्राचीन ज्ञान की उपेक्षा की गई। आगे चलकर खरा इतिहास और ज्ञान भारतियों तक नहीं पहुंचने दिया। इस प्राचीन भारतीय विज्ञान-तंत्रज्ञान परंपरा को पुनरुज्जीवित करने की आवश्यकता है, ऐसा प्रतिपादन हिन्दू जनजागृति समिति के राष्ट्रीय मार्गदर्शक सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी ने किया। 

आपको बता दें, भारत के ज्यादातर प्राचीन विख्यात मंदिर, और दूसरे भवन का सृजन भगवान विश्वकर्मा के द्वारा ही संभव हो पाया। हमारे देश में जितने भी सुविख्यात नगर और राजधानियां थीं, उनका निर्माण भी विश्वकर्मा ने ही किया था, जैसे सतयुग का स्वर्ग लोक, त्रेतायुग की लंका, द्वापर की द्वारिका और हस्तिनापुर।

माना जाता है कि पांडवों के लिए माया सभा भी विश्वकर्मा ने ही बनाई थी। ऋग वेद में कहा गया है कि स्थापत्य वेद जो मशीन और आर्किटेक्टर की साइंस है, उसे भी विश्वकर्मा ने बनाया है। दिवाली के बाद गोवर्धन पूजा पर भी इनकी पूजा की जाती है। 

प्राचीन भारतीय ज्ञान सिखाए जाने से भारत विश्वगुरु के रूप में पुनर्स्थापित होगा!

चार वेद ज्ञान का मूल स्रोत हैं। वेदों में बीजरूप में विद्यमान ज्ञान का विस्तार वेदांग, दर्शनशास्त्र, उपवेद आदि में किया हैय परंतु दुर्भाग्यवश आज प्राचीन ज्ञानग्रंथ अखंडित रूप में उपलब्ध नहीं हैं। जो प्राचीन ज्ञान उपलब्ध है, वह क्रमिक पाठ्यक्रम में नहीं पढाया जाता। वैसा होने पर भारत विश्वगुरु के रूप में पुनर्स्थापित हो सकेगा। भारतीय दृष्टि का अभाव, यथार्थ शास्त्र का अज्ञान, दूषित उद्देश्य और विदेशी विचार के कारण आज भारतीय शास्त्र के संबंध में प्रश्न उपस्थित किए जाते हैं। विमानशास्त्र कपोलकल्पित है, ऐसा कुप्रचार किया जाता है, परंतु वर्तमान काल में हुए शोध द्वारा भी प्राचीन भारतीय ज्ञान की पुष्टि मिलती है। प्राचीन भारतीय विज्ञान और तंत्रज्ञान के अभ्यासक तथा लेखक श्री. विजयकुमार उपाध्याय ने बताया है कि, यूरोप में जो वैज्ञानिक उन्नति देखने को मिली है, उसके पीछे का ज्ञान परोक्ष रूप में भारत से ही अरब, पर्शिया मार्ग से यूरोप में पहुंचा है।

जर्मनी से गणितज्ञ और ‘हिन्दू मेथमेटिक्स’ नामक पुस्तक के लेखक डॉ. भास्कर कांबळे ने ‘हिन्दू गणित के ट्रिग्नोमेट्री’ विषय पर जानकारी देते हुए कहा है कि गणित का उद्भव ग्रीस में नहीं, अपितु भारत में ही हुआ है। विदेशी गणितज्ञों के हजारों वर्ष पहले श्लोक अथवा सूत्र रूप से जानकारी देनेवाले भास्कराचार्य, आर्यभट्ट, माधव, ब्रह्मगुप्त की जानकारी भी डॉ. कांबळे ने दी है। उसी प्रकार सद्गुरु (डॉ.) पिंगळेजी ने प्राचीन नौकानयनशास्त्र तथा विजय कुमार उपाध्याय ने इस परिसंवाद में शिल्पशास्त्र संबंधी जानकारी दी।

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