भारतीय समाज और मंदिरों की प्रासंगिकता

    
Tirupati Temple
भारतीय समाज एक ऐसे विशाल सागर की तरह है, जो न जाने कितनी संस्कृतियों को अपने अंदर समेटे हुए है। ये संस्कृतियां न केवल सुरक्षित रहीं हैं, बल्कि इनमें विकास की अविरल धारा भी निर्बाध रूप से बहती रही है। आज चर्चा का विषय यही है कि युग परिवर्तन के बावजूद भारतीय समाज की यह विशेषता समय के साथ और मजबूत हुई है। यह समाज में होने वाले परिवर्तन को न केवल आत्मसात करता है, वरन् उस परिवर्तन के फलस्वरूप समाज में जो भिन्नता आती है, उसे भी सकारात्मक तरीके से ग्रहण कर लेता है। 
यह कार्य जितना देखने में या कहने में सरल लगता है, वास्तव में इतना सरल है नहीं। इसके लिए एक सकारात्मक सोच वाले मस्तिष्क की आवश्यकता है और अगर यह सकारात्मकता आज भी भारतीय समाज में विद्यमान है, तो इसका सबसे मुख्य कारण है अध्यात्म। अध्यात्म हमारी संस्कृति का मूल है, अर्थात अध्यात्म से जुड़ा रहना हमारे समाज की सबसे प्रमुख और पुरातन विशेषता है। युग बदला, समाज बदला और समाज की संरचना में भी बदलाव आते रहें हैं। लेकिन नहीं बदला तो भारतीय समाज की आध्यात्मिकता, समयानुसार आश्रमों का स्थान गुरुकुलों ने लिया और गुरुकुलों का स्थान मंदिरों ने। 
मंदिर आज के आधुनिक समाज की आस्था का प्रमुख केंद्र हैं। कोई भी इंसान मंदिर क्यों जाता है? क्यों हमारे पूर्वजो ने स्थापना की? क्या जरूरत थी मंदिरो की? ये विचार कई बार मन में बिजली की तरह कौंध जाता है। पूजा या प्रार्थना तो इंसान अपने मन में कर सकता है, या करता भी है।  जिन पवित्र और पावन उद्देश्यों को लेकर इन मंदिरो की स्थापना की गई थी, क्या वह उद्देश्य या लक्ष्य प्राप्त कर रहे हैं। ये भी एक बड़ा यक्ष प्रश्न है, हम सब बड़ी ही श्रद्धा के साथ मंदिर जाते है। जो व्यक्ति जिस भी भगवान में अपनी आस्था रखता है और वह उस भगवान की पूजा अर्चना भी करता है। भगवान से अपने और अपने परिवार के लिए धन, यश और उत्तम स्वास्थ्य मांगता है। क्या मंदिरो का यही उद्देश्य रह गया है, या उसके पीछे कुछ और भी है? कही ऐसा तो नहीं की हम जिन लक्ष्यों या उद्देश्यों को लेकर चले थे, वो कहीं खो गए हैं। 
मंदिरो का प्रमुख उद्देश्य है कि हमारी उस पुरातन संस्कृति को जिसे हमारे संतो और ऋषियों ने अपने तप से न केवल बचाया, बल्कि विकसित भी किया। जिससे पूरे विश्व ‘‘वासुदेव कुटुम्बकम’’ के एक महीन और सशक्त धागे में बँध सके।  हमारे वेदों के अथाह ज्ञान साधारण मनुष्य को सुलभ कराना भी मंदिरो और ऐसे ही धार्मिक प्रतिष्ठानों का एक मुख्य काम होना चाहिए। क्योंकि किसी भी समाज सकारात्मक विकास तभी हो सकता है, जब वह अपनी जड़ो को मजबूती से पकड़ कर रखे। मंदिरो की कार्य प्रणाली इस प्रकार की होनी चाहिए, जिससे समाज के सभी वर्गों का मेल-मिलाप आपस में बढ़ सके। समाज का संपन्न वर्ग समाज के उस दबे और शोषित वर्ग को साथ लेकर चले और एक नए और आधुनिक भारत का निर्माण हो। परिवार के मुखिया को मंदिरो में किसी भी प्रकार का आयोजन हो तो उसकी तैयारियों में हिस्सा लेने के लिए अपने बच्चों को प्रेरित करना चाहिए। मंदिर के पुजारियों को कुछ समय निकालकर समाज के भिन्न-भिन्न वर्गों के लोगों से वार्तालाप और व्यवहार बढ़ाना चाहिए। जिससे की सभी लोग एक साथ मिलकर एक इकाई के रूप में कार्य कर सकें।
ये बात सच है कि जब भी भारत पर कोई विपत्ति आई है चाहे वह अकाल, बाढ़ या कोई बीमारी हो। समाज की सेवा के लिए सभी मंदिर अपने खजानों के दरवाजे निसंकोच खोल देते हैं और अपनी सामथ्र्य से अधिक दान, इस समाज के कल्याण के लिए देते हैं। जैसा की पूरे संसार ने देखा है कि कोरोना नाम की बीमारी ने लोग ग्रसित हैं। इसे देखते हुए सभी मंदिरों ने मानव मात्र की सहायता के लिए अपने भण्डार खोल दिए और करोड़ों रूपये प्रधानमंत्री केयर फण्ड में भी दिए।  
लेकिन अब समय आ गया है कि ये मंदिर हमारे वेदो में दिए ज्ञान को साधारण जनमानस तक पहुचायें, हमारी संस्कृति को आगे बढाए और आने वाली नई पीढ़ी को अपना पुरातन ज्ञान देकर इस समाज में अपनी सार्थकता को सिद्ध करे।     
 

Add comment


Security code
Refresh