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राहु गोचर 2020ः जानिए इसका आपकी राशि पर क्या पड़ेगा प्रभाव

23 सितंबर, 2020 को सुबह लगभग 5 बजकर 28 मिनट पर राहु मिथुन से वृषभ राशि में गोचर करेगा और 12 अप्रैल, 2022 तक रहेगा, लगभग 18 महीने। वैदिक ज्योतिष में राहु को छाया ग्रह के रूप में माना जाता है, लेकिन इसका प्रभाव हर राशि पर देखा जाता है। आमतौर पर, यह उस ग्रह के अनुसार परिणाम दिखाता है जिसमें इसे रखा गया है। हालांकि, अगर इसे अकेले रखा गया है, तो यह शनि के परिणाम को ही दर्शाता है। यदि राहु सकारात्मक है तो राज योग, वित्तीय लाभ और विदेश यात्रा देने की क्षमता रखता है। लेकिन अगर यह नकारात्मक है, तो यह निराशा, भ्रम, आलस्य, वासना देगा। राहु के इस गोचर का प्रभाव सभी राशियों पर शुभ-अशुभ रूप में पड़ेगा। 8 राशियों पर राहु का गोचर लाभकारी रहने के प्रबल संकेत दे रहा है, लेकिन 4 राशियों के लिए राहु का परिवर्तन कष्टकारी रहने के संकेत है। ये राशियां इस प्रकार हैं...

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बुधवार के लिए आपका लकी नंबर और शुभ रंग

अंक ज्योतिष की गणना में किसी व्यक्ति का मूलांक उस व्यक्ति की तारीख का योग होता है। उदाहरण के लिए समझिए यदि किसी व्यक्ति का जन्म 23 अप्रैल को हुआ है तो उसकी जन्म तारीख के अंकों का योग 2+3=5 आता है। यानि 5 उस व्यक्ति का मूलांक कहा जाएगा। अगर किसी की जन्मतिथि दो अंकों यानि 11 है तो उसका मूलांक 1+1= 2 होगा। वहीं जन्म तिथि, जन्म माह और जन्म वर्ष का कुल योग भाग्यांक कहलाता है। जैसे अगर किसी का जन्म 22- 04- 1996 को हुआ है तो इन सभी अंकों के योग को भाग्यांक कहा जाता है।

Kundali

ज्योतिषः घर पर रंगाई-पुताई जन्म कुंडली में शुभ ग्रह देखकर ही करवाएं


कई बार वास्तु व ग्रह अनुकूल होने पर भी मन अशांत, भ्रमित और व्याकुल हो जाता है। इसका कारण का रंग भी हो सकता है। रंगों का अपना सिद्धांत होता है। प्रकृति ने हमें अनेक रंग प्रदान किए हैं परंतु वे सभी अलग-अलग प्रभाव हमारे जीवन में डालते हैं। भवन का रंग-रोगन करवाने से पूर्व कुंडली के ग्रहों पर भी विचार अवश्य करना चाहिए। वास्तु शास्त्र के अंतर्गत इस विषय में कुछ ध्यान रखने योग्य बाते हैं, जो इस प्रकार हैं
Akshaya Tritiya

अक्षय तृतीयाः जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और मान्यताएं


अक्षय तृतीया के पीछे बहुत सारी मान्यताएं और बहुत सारी कहानियां भी जुड़ी हैं. इसे भगवान परशुराम जन्मदिन यानी परशुराम जयंती के रूप में भी मनाया जाता है. भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम के अलावा विष्णु के अवतार नर व नारायण के अवतरित होने की मान्यता भी इसी दिन से जुड़ी है. यह भी मान्यता है कि त्रेता युग का आरंभ इसी तिथि से हुआ था. मान्यता के अनुसार इस तिथि को उपवास रखने, दान करने से अनंत फल की प्राप्ति होती है यानी इस दिन व्रत रखने वाले को कभी भी किसी चीज का अभाव नहीं होता, उसके भंडार हमेशा भरे रहते हैं. चूंकि इस व्रत का फल कभी कम न होने वाला, कभी न घटने वाला, कभी नष्ट न होने वाला होता है, इसलिए इसे अक्षय तृतीया कहा जाता है. 
अक्षय तृतीया से जुड़ी मान्यताएं
माना जाता है कि जो लोग इस दिन अपने सौभाग्य को दूसरों के साथ बांटते हैं, उन्हें ईश्वर की असीम अनुकंपा प्राप्त होती है. इस दिन दिए गए दान से अक्षय फल की प्राप्ति होती है. सुख-समृद्धि और सौभाग्य की कामना से इस दिन शिव-पार्वती और नर-नारायण की पूजा का विधान है.
अक्षय तृतीया के दिन दान को श्रेष्ठ माना गया है. चूंकि वैशाख मास में सूर्य की तेज धूप और गर्मी चारों ओर रहती है और यह आकुलता को बढ़ाती है, तो इस तिथि पर शीतल जल, कलश, चावल, चना, दूध, दही आदि खाद्य पदार्थों सहित वस्त्राभूषणों का दान अक्षय व अमिट पुण्यकारी होता है.
अक्षय तृतीया के दिन ये 14 दान हैं महत्वपूर्ण
गौ, भूमि, तिल, स्वर्ण, घी, वस्त्र, धान्य, गुड़, चांदी, नमक, शहद, मटकी, खरबूजा, कन्या