Pandav Nritya 9

गढ़वाल में पांडव नृत्य की क्या है सार्थकता

महाभारत के युद्ध से पूर्व और युद्ध समाप्त होने के बाद भी पांडवों ने गढ़वाल में लंबा समय व्यतीत किया। महाभारत के युद्ध के बाद कुल हत्या, गोत्र हत्या व ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए कृष्ण द्वैपायन महर्षि वेदव्यास ने पांडवों को शिव की शरण में केदारभूमि जाने की सलाह दी थी।

Tyagi

5 लाख लोगो ने प्राकर्तिक चिकित्सक फेसबुक पर लाइव देखी

24 राज्यो में 5 लाख से अधिक लोगो ने आज फेसबुक वार्ता में सूर्य फाउंडेशन व आई एन ओ के द्वारा आयोजित प्रोगाम में भाग लिया। प्रकति और मानव का सम्बन्ध प्राकर्तिक चिकित्सा की विधिया एवं आहार पर हम कैसे प्राकर्तिक चिकित्सा एवं आहार द्वारा शरीर की जीवनी शक्ति बढ़ाकर स्वस्थ रह सकते है। 

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कोरोना की प्राकृतिक चिकित्सा फेसबुक पर लाइव

देश को कोरोना वायरस महामारी से बचाने के लिए जारी लॉक डाउन के दौरान सूर्या फाउण्डेशन व इंटरनेशनल नेचुरोपैथी ऑर्गनाइजेशन (आई.एन.ओ.) ने राज्य स्तरीय वरिष्ठ सदस्यों की मांग पर आई.एन.ओ. के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अनंत बिरादर जी ने निर्णय लिया है कि 18 अप्रैल से 5 मई के बीच आई.एन.ओ. के फेसबुक पेज पर कोरोना रोकथाम में प्राकृतिक चिकित्सा एवं सम्पूर्ण स्वास्थ्य विषय पर लाइव वार्ता का सीधा प्रसारण प्रतिदिन सुबह 11 बजे से किया जा रहा है। 

इंटरनेशनल नेचुरोपैथी आर्गेनाइजेशन (आई.एन.ओ.), गाजियाबाद - सचिव - डॉ. संजय त्यागी ने केंद्रीय नेतृत्व का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अनंत बिरादर ने सर्व सम्मति से जो निर्णय लिया है, वह देश के स्वास्थ्य के लिए हितकर होगा| 

श्री अनंत बिरादार जी ने बताया कि कोरोना महामारी के संदर्भ में देश के वरिष्ट जाने-माने प्राकृतिक चिकित्सा-योग विशेषज्ञ एवं राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय धर्मगुरू आचार्य लोकेश मुनि (दिल्ली), सदगुरू योगीराज डॉ मंगेशदा (मुंबई), आचार्य मोहन गुप्ता (दिल्ली), डॉ सुरक्षित गोस्वामी (दिल्ली), डॉ विश्वरूप रॉय चैधरी (फरीदाबाद), प्रसिद्ध अभिनेत्री एवं आई.एन.ओ. ब्रान्ड एंबेस्डर ईशा कोप्पीकर (मुंबई), डॉ सलिला तिवारी (दिल्ली), डॉ गोविंदा (दिल्ली), डॉ विमल मोदी (गोरखपुर), डॉ जितेन्द्र आर्या (पुणे), डॉ अरूण शर्मा (USA), डॉ नागेन्द्र नीरज (हरिद्वार), डॉ एम. के. तनेजा (मुजफ्फरनगर), डॉ डी. एन. शर्मा (उत्तराखंड), डॉ बी.टी. चिदानंद मति (बैंगलोर), डॉ आर. एस. डबास (दिल्ली), डॉ अमित नागपाल (दिल्ली), डॉ जयदीप आर्य (हरिद्वार) आदि विद्वान फेसबुक लाईव वार्ता के माध्यम से देशवासियों को स्वास्थ, स्वावलंबन के परति मार्गदर्शन दे रहे हैं। 

फेसबुक लाइव के प्रथम दिन 18 अप्रैल को डॉ. विश्वरूपराय चैधरी के सत्र को 2 लाख से अधिक लोगों ने देखा। सोशल मीडिया के माध्यम से भारतीय चिकित्सा पद्धति का ज्ञान व लाभ घर-घर तक पहुँचाने के इस अनोखे प्रयास कि देश भर में प्रशंसा हो रही है। आयुष मंत्रालय, भारत सरकार एवं अन्य प्रतिष्ठित समाज सेवी संस्था द्वारा लॉक डाउन के दौरान चलाए जा रहे इस सकारात्मक प्रयोग की प्रशंसा हो रही है। 

डा. संजय त्यागी - सचिव, गाजियाबाद आई.एन.ओ. ने कहा है कि हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अनन्त बिरादर जी के नेतृत्व में देशवासियों को प्राकृतिक चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विषय पर आयोजित वार्ता में स्वास्थ्य संबंधी जानकारी घर बैठे प्रदान की जा रही है। डा. संजय त्यागी ने बताया कि इस वार्ता को सफल बनाने में श्री अनन्त बिरादर जी के दिशानिर्देशों का पालन किया गया है उनके नेतृत्व में आई.एन.ओ. केंद्रीय पदाधिकारी एवं केन्द्रीय कार्यालय के पदाधिकारियों का आभार व्यक्त किया है। 

लॉक डाउन के दौरान योग-नैचुरोपैथी का ज्ञान-वर्धन एवं स्वास्थ्य स्वावलंबन हेतु, जिले के नागरिको से निवेदन है, कि इंटरनेशनल नेचुरोपैथी ऑर्गनाइजेशन (आई.एन.ओ.) के फेसबुक पेज को प्रतिदिन सुबह 11 बजे देखकर खुद भी स्वस्थ रहें और अपने परिवार को भी स्वस्थ रखें और एक बेहतर और स्वस्थ समाज के निर्माण में सहयोग करें।

River

पहले कौन साफ करता था नदियां....

राज कुमार 

लाखों करोड़ों सालों से ये नदियां धरती पर यूं ही बह रही हैं। कभी-कभी वे अपना रास्ता बदल देती हैं। और कभी-कभी आस-पास की धरती को अपने आगोश में समेटने का प्रयास करती हैं। इन लाखों-करोड़ों सालों में वो कौन था जो इन नदियों को साफ करता था।
वो कौन था जिसके चलते यह साफ, नीला पानी कल-कल करके बहता रहता था। किसके चलते इसका पानी इतना निर्मल बना हुआ था कि उसे बेहिचक कोई भी अंजुरी में भरकर पी सकता था।
हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि गंदा होने से पहले नदियां साफ थीं। वे स्वच्छ थीं। निर्मल थीं। लॉकडाउन ने नदियों के बारे में भी कुछ खुलासे किए हैं। नदियों में होने वाला प्रदूषण मुख्यतः तीन तरह का है। नदियों में उद्योगों से निकला हुआ गंदा पानी गिरता है। नदियों में घरों से निकलने वाला सीवरेज गिरता है। करोड़ों की संख्या में नहाने, कपड़ा धोने, पूजा सामग्री फेंकने, घर निर्माण का मलबा फेंकने से नदिया गंदी होती हैं।
उपरोक्त तीनों तरीकों से नदियां गंदी होती हैं। लॉकडाउन के चलते इन तीन में दो गतिविधियां ठप पड़ गई हैं। उद्योगों को बंद कर दिया गया है। इसलिए इसका गंदा पानी नदियों में नहीं गिर रहा है। सीपीसीबी की रिपोर्ट के मुताबिक यमुना का दिल्ली से गुजरने वाले हिस्से में हर दिन साढ़े तीन करोड़ लीटर से (35 मिलियन लीटर पर डे) गंदा पानी इस समय नहीं गिर रहा है। इसके चलते नदी थोड़ा साफ हुई है। लेकिन, घरों से निकलने वाला सीवरेज अभी भी नदियों में ही गिरता है।
सीपीसीबी की गंगा के बारे में रिपोर्ट भी कुछ ऐसे ही खुलासे करती है। चार प्रदेशों से गुजरने वाली गंगा नदी में कुल मिलाकर 3500 मिलियन लीटर पर डे पानी गिरता है। इसमें से 1100 एमएलडी पानी का शुद्धीकरण करने के बाद गंगा में छोड़ा जाता है। जबकि, 2400 एमएलडी पानी बिना शुद्धीकरण के गंगा में छोड़ दिया जाता है। लॉकडाउन के बाद पूरे उद्यम बंद हैं। इसके चलते फिलहाल गंगा में 300 एमएलडी गंदा पानी गंगा में नहीं जा रहा है। इसके चलते नदी कुछ हद तक साफ दिख रही है।
लेकिन, घरों से निकलने वाले सीवरेज का बड़ा हिस्सा अभी भी नदियों में जा रहा है। नदी के घाट सूने हैं। यहां पर नहाने वाला कोई नहीं। धोबी घाट पर कपड़े नहीं धोए जा रहे। पूजन सामग्री भी नहीं डाली जा रही है। निर्माण सामग्री का मलबा भी नहीं डाला जा रहा है। लेकिन, घरों से निकलने वाला सीवरेज अभी भी नदियों को नाले में तब्दील किए हुए हैं।
जाहिर है कि बिना इसका हल निकाले नदियों को साफ नहीं किया जा सकता। अगर हम अपना गंदा पानी नदी में नहीं डालेंगे चाहे वो उद्योगों से निकलने वाला हो या घरों से, तो नदी अपने आप साफ हो जाएगी।
इस कचरे की व्यवस्था किए जाने की जरूरत है। नदियां कोई सीवरेज का नाला नहीं हैं। जो कचरे को बहाकर समुंदर में ले जाने का काम करें।
लाखों-करोड़ों सालों से कोई नदियों को साफ नहीं करता था, बस उसे इस कदर गंदा करने वाला कोई नहीं था।

Man

आम जन के मन की बातः लाॅक डाउन में सामान्य जन-जीवन पर असर

सामान्य नागरिकों के जीवन पर लॉक डाउन का क्या परिणाम होंगे? क्या वो ऐसी परिस्थिति जब न कोई काम है और न ही कहीं
से पैसा आने की उम्मीद है?तो क्या वो ऐसी विकट परिस्थिति से निकल पायेगा या नहीं? अपने मन की बात में बता रहें हैं
नीरज कौशिक

लाॅक डाउन कहने को केवल दो शब्द हैं - लेकिन इसके समाज पर इसके प्रभाव, चाहे वो सकारात्मक हों या नकारात्मक, इतने विस्तृत हैं कि उनको शब्दों में बयान करना मुमकिन नहीं है। हमारे समाज में जिनती तरह के लोग हैं, उतनी तरह की बातें।

इसमें कोई शक नहीं है कि हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी की दूरदर्शिता और उनकी कार्यशैली का कोई जवाब नहीं है। उन्होंने सरकार की तरफ से लाॅक डाउन की वजह से घर में बैठे लोगों को सरकारी लाभ देने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। देश के लोगों ने भी, कुछ अपवादों को छोड़कर ये मानकर पूरा सहयोग किया है कि देश सेवा आम नागरिक घर में बैठकर भी कर सकता है।

लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं कि आम नागरिक अपना फर्ज़ निभाते हुए अपने परिवार को भुखमरी के कगार पर ले जा रहा है। क्या यह संभव है कि जो सरकारी सहायता उसे मिल रही है वो इतनी पर्याप्त है कि वो उससे अपने परिवार का भरण-पोषण अच्छी तरह से कर सके।

ये सब जानते हैं कि लाॅक डाउन के कारण सरकार की आमदनी के अधिकतर रास्ते बंद हो गए हैं। लेकिन एक गरीब अनपढ़ इंसान को ये सब बातें कहां समझ आती हैं। उसे तो जब ये दिखाई देता है कि उसके छोटे से बालक को दूध नहीं मिल रहा है, उसकी बीमार माॅं को दवाई नहीं मिल रही है आदि समस्याएं दिखाई देती हैं, तब उसका दिमाग जैसे शून्य हो जाता है।

एक 6ग8 के कमरे में, जिसमें रसोई भी है, वो अपने बच्चों के साथ कैसे पूरा दिन बिताते हैं। मनोरंज के नाम पर उसके पास सीमित साधन हैं। वो चाहता तो है कि वो इस तालाबंदी का समर्थन करे, लेकिन क्या उसके लिए ये संभव है। और ये भी एक यक्ष प्रश्न है कि क्या उसकी जरूरत की सभी चीजें सरकारी सहायता के रूप में उसे प्राप्त हो रही है या नहीं?

हालांकि उससे भी बड़ी विपत्ति उस निम्न मध्य वर्ग के ऊपर टूट पड़ी है जो कि अपना सारा जीवन इस सपने को हकीकत बनाने में लगा देता है कि एक न एक दिन वो भी उस कतार में खड़ा होगा, जहां लोग उसे केवल इसलिए सम्मान देेंगे कि उसके पास भी धन, प्रोपर्टी और स्टेटस है।

इस सपने को पूरा करने के लिए वो न दिन देखता है और न ही रात। वो सिर्फ लगा रहता है एक ही धुन में। दुनिया को दिखाने के लिए वो अपने स्टेटस को बनाने के लिए आडम्बर के साधन जैसे- अच्छा घर, कार, टीवी, फ्रिज, एसी आदि चीजें किस्तों पर लेता है। और फिर लग जाता है उन सब सामानों की किस्तें भरने में। सर पर खर्चे का बोझ बढते ही उसे अपनी आमदनी कम लगने लगती है।

फिर वो लग जाता है अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए। नौकरी या बिजनेस करने वाला व्यक्ति, चाहे उसकी आमदनी कितनी भी हो, वो कुछ अलग से कमाने का तरीका ढूंढने लगता है। क्रेडिट कार्ड और पर्सनल लोन और भी कई तरह के लोनों के चक्रव्यूह में वो ऐसा फंसता चला जाता है कि जीवन की अंतिम सांस तक वो इन्हीं क्रियाकलापों में लगा रहता है। उसे पता ही नहीं चलता की कब उसका सारा जीवन इसी उहापोह में निकल गया।

अचानक एक ऐसी खबर आती है जो निम्न वर्ग और निम्न मध्य वर्ग को हिलाकर रख देती है। खबरों से पता चलता है कि कोरोना जैसी कोई बीमारी देश में आ गई है, जिसके कारण देश में लाॅक डाउन की घोषणा करनी पड़ती है। ऐसे समय में वो आसमान से धरती पर ही नहीं गिरता बल्कि कर्ज़ के पाताल में धंस जाता है। ऐसे में उसे अपने से अच्छे वो मजदूर लगने लगते हैं जो समय आने पर कह देते हैं कि भाई हम तो गरीब हैं और सरकार या किसी भी व्यक्ति के सामने अपने हाथ पसार देते हैं। लेकिन वो निम्न मध्य वर्ग का आदमी कहा जाए, जो शायद यह भी नहीं कह सकता। क्योंकि उसने अपने ऊपर झूठी इज्ज़त की चादर जो ओढ़ी हुई है, जिससे वो चाहते हुए भी नहीं निकल सकता।

लाॅक डाउन का यह समय अपने अन्दर जाने कितनी अनकही और दुखभरी कहानियां अपने अंदर समेटे हुए है, जिसको कहना भी उतना ही झकझोर देने वाला है, जितना की सुनना।

ईश्वर दुनिया को इतनी शक्ति दे कि वो इस महामारी पर विजय पा सकें और जीवन की इस लगातार बहने वाली धारा में अपना सुखमय जीवन व्यतीत कर सके।