जेलेम-ओरियामघाट कृषक विकास समिति की सभा में किसानों का छलका दर्द

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जोनाईः दिल्ली में केंद्र सरकार द्वारा नया कृषि बिल कानून लाने के विरोध में किसानो का आन्दोलन चल रहा है। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के लिए पूरे देश में कृषि कानून के विरोध में किसान आन्दोलन चला रहे हैं। वहीं, असम और अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्र में स्थित जामपानी नामक अंचल के किसानो को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) क्या हैं, इसका भी पता नही हैं। अंचल के किसानों की सुध लेने के लिये बीते बुधवार को जेलेम ओरियामघाट कृषक विकास समिति के तत्वावधान में किसानों और व्यापारियों के बीच एक कृषक सभा ओरियामघाट के मुरंगघर के प्रांगण में किया गया। 

सभा की अध्यक्षता जेलेम ओरियामघाट कृषक विकास समिति के अध्यक्ष लखीनंद्र पातिर ने की। सभा का संचालन प्रदीप बोरी ने किया। उक्त सभा में किसानों ने आरोप लगाया है कि खेती के दौरान स्थानीय व्यवसायियों द्वारा यूरिया और बीजों का आपूर्ती करते हैं मगर व्यवसायियों द्वारा यूरिया अथवा बीजों के आपूर्ति के सालभर बाद में दोगुना से भी अधिक मूल्य लिया जाता है। जिस कारण यहां के किसान हमेशा व्यवसायियों के कर्ज के तले दबे रहते हैं। साल भर कड़ी धूप और मसलाधार बारिश में भी खेतों में काम करके अनाज उगाने के बाद भी किसान कर्ज मे डूबे रहते हैं। 

कुछ किसानों का कहना है कि कई दुकानदार सीजन में यूरिया का भाव 1900 रुपए बताते हैं, मगर वहीं व्यवसायी साल के अंत में उस यूरिया का भाव 3800 रुपए लगाकर हमसे हिसाब करते हैं। इतना ही नहीं एक किसान ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा है कि उसके खेत में उगाई गई मक्का (मकई) का भाव अचानक कम हो जाने के कारण वह इस साल अपना मक्का नही बेच पाया। साथ ही उसका कहना था कि वर्तमान में स्थानीय व्यवसायियों द्वारा मक्का प्रति क्विंटल 600 से 800 रुपए का बताया जा रहा है। अगर इतने दाम में मक्का बेचना पड़ा तो हमारी महीनों की मेहनत और बीज का दाम भी मुश्किल से भी नही निकल पायेगा। 

सभा में स्थानीय व्यवसायियों द्वारा अँचल के अनपढ़ और कम पढ़े-लिखे किसानों के शोषण पर चिंता व्यक्त की गई। दूसरी ओर इस सभा में कई किसानों ने आरोप लगाते हुए कहा कि कुछ व्यवसायी आज भी किसानों को गुलाम बनाकर रखें हुए हैं। जो किसानों को अपने खेतों में उगाये गये मकई, सरसों, धान, आलू और अन्य साग सब्जियों को लेकर सीधे बाजार में नहीं बेच सकते। जिस कारण आज भी उन्हें बिचैलिए के माध्यम से ही अपने खेतों में उगाये गये फसल को बेचना पड़ता हैं और अपनी मेहनत का समान भी औने-पौने दामों में बेचना पड़ता हैं। दूसरी तरफ, बिना मेहनत के ही बिचैलियां अपने जेब भरते हैं।

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