उत्तराखंड का अनोखा गाँव, जहां नहीं होता पलायन, जानें क्यों...

Paneer

देहरादूनः उत्तराखण्ड में लगभग सभी गांवों में पलायन का सिलसिला लगातार जारी है। पलायन का मुख्य कारण है राज्य में रोजगार का न होना। इसलिए गांवों से युवा नौकरी की तलाश में शहरों में जाकर बस गये हैं। हालत ये है कि कई गांव तो पूरी तरह से खाली हो चुके हैं, अगर वहां कोई है तो बूढे माँ-बाप जिनको ये आशा है कि कभी तो हमारे गांव में फिर से खुशहाली लौटेगी। बीबीसी के मुताबिक, उत्तराखण्ड में एक गांव ऐसा भी है जहां आज भी कोई पलायन करने को तैयार नहीं है। जी हाँ, क्योंकि गांववालों ने अपने गांव में ही रोजगार का जरिया ढूंढ लिया है और उन्हें कहीं और जाने की जरूरत कभी महसूस ही नहीं हुई।

मसूरी से करीब 20 किलोमीटर दूर टिहरी जिले के जौनपुर विकास खंड स्थित रौतू की बेली गाँव उत्तराखंड में ‘पनीर विलेज’ के नाम से मशहूर है। करीब 1500 लोगों की आबादी वाले इस गाँव में 250 परिवार रहते हैं और गाँव के सभी परिवार पनीर का व्यवसाय करते हैं। खास बात ये है कि ये लोग पनीर अपने घरों में ही बनाते हैं, इसलिए इस पनीर की क्वालिटी बहुत अच्छी होती है और इसकी डिमांड भी काफी है।

इस गांव की एक खास बात और भी है कि अब यहां एक नई रस्म भी ईजाद हो चुकी है। इस गांव में जब भी कोई नई बहु आती है तो सबसे पहले उसे पनीर बनाना सिखाया जाता है। यानी नई बहु भी पनीर बनाने में महारत हासिल कर लेती है और फिर वह भी पूरे घर के साथ लग जाती है पनीर बनाने में।

जानकारी के मुताबिक, रौतू की बेली गांव के पूर्व ब्लॉक प्रमुख कुंवर सिंह पंवार ने ही इस गांव में सबसे पहले पनीर बनाने का काम 1980 में शुरू किया था। कुंवर सिंह बताते हैं, ‘‘1980 में यहाँ पनीर 5 रुपये प्रति किलो बिकता था। उस समय पनीर यहाँ से मसूरी स्थित कुछ बड़े स्कूलों में भेजा जाता था। वहाँ इसकी काफी डिमांड रहती थी।’’

उनके मुताबिक 1975-76 में इस इलाके में गाड़ियाँ चलनी शुरू हुईं थीं, तब यहाँ से बसों और जीपों में रखकर पनीर मसूरी भेजा जाता था। यहाँ आसपास के इलाकों में तब पनीर नहीं बिकता था, क्योंकि लोग पनीर के बारे में इतना जानते नहीं थे। यहां तक कि ये भी नहीं जानते थे कि पनीर की सब्जी भी बनती है।

देहरादून पहुंचा शुद्ध पनीर
कुंवर सिंह ने बताया, ‘‘2003 में उत्तराखंड राज्य बनने के बाद इस गांव को उत्तरकाशी जिले से जोड़ने वाली एक रोड़ बनी जिसकी वजह से यहाँ के लोगों को काफी फायदा हुआ। उत्तरकाशी जाने वाली रोड के बन जाने की वजह से इस गाँव से होकर देहरादून और उत्तरकाशी आने-जाने वाले लोगों की संख्या बढ़ी है।’’ उसके बाद से यहां का पनीर पहले से ज्यादा प्रचलित हुआ। इस रोड से आने-जाने वाले लोग अक्सर यहीं से आकर पनीर खरीदने लगे। रौतू की बेली गाँव के पनीर में मिलावट न होने और सस्ता होने की वजह से देहरादून तक के लोग इसको खरीदने लगे।’’

सबसे कम पलायन
कुंवर सिंह बताते हैं कि उत्तराखंड के बाकी इलाकों की तुलना में अगर देखें तो टिहरी जिले में यह पहला गाँव है जहां सबसे कम पलायन हुआ है। कुछ 40-50 युवा ही गाँव से बाहर पलायन करके काम करने के लिए बाहर गए थे, लेकिन कोरोना महामारी के दौरान वा भी वापस घर लौट आए।

गाँव में कम पलायन का सबसे बड़ा कारण यह है की यहाँ के लोग अपनी थोड़ी बहुत आजीविका चलाने के लिए पनीर का काम करते हैं। थोड़ी-बहुत खेती बाड़ी भी लोग कर लेते हैं, जिसकी वजह से पलायन करने की कभी जरूरत ही महसूस नहीं हुई।

कठिन काम है पनीर बनाना
कुंवर सिंह बताते हैं कि पहाड़ पर पनीर बनाना बहुत कठिन काम है। यहाँ अगर किसी के पास एक भैंस है अगर वह भैंस बिल्कुल नई है तो उसे साल भर पालना पड़ता है। यहां गांव के पास भैंस के लिए चारा नहीं मिलता है। चारा लाने के लिए गांव की बहू-बेटियों को दूर पहाड़ों पर चढ़कर जाना पड़ता है, कभी-कभी यहाँ चारे की भी कमी पड़ जाती है, जिसके लिए काफी दूर दूसरे गाँवों तक जाना पड़ता है।

सरकार से माँग
गांववालों की सरकार से मांग है कि भैंस खरीदने में लोन की व्यवस्था कर दे और चारा अगर मुफ्त में या सब्सिडी पर उपलब्ध हो जाए तो लोगों को यहां थोड़ी राहत मिल सकती है।