अपने हौसले से नारी भर रहीं ऊंची उड़ान, ना कोई शिकायत, ना कोई थकान

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लाॅकडाउन में वैसे तो कई मिसालें हैं, लेकिन 13 साल की ज्योति जो अपने से कहीं ज्यादा वजन वाले अपने पिता और एक बैग के साथ साईकिल पर लगभग 1200 किलोमीटर की यात्रा करके गुरूग्राम से अपने घर दरभंगा पहुंच ही गयी। सलाम है उसके इस ज़ज्बे को। 

13 साल की ज्योति अपने पिता (मोहन पासवान) को साईकिल पर गुरूग्राम से दरभंगा लेकर चल दी। गुरूग्राम से दरभंगा की दूरी लगभग 1200 किलोमीटर है। 9 मई को ज्योति अपने पिता के साथ गुरूग्राम से निकली और लगभग 7 दिन बाद 15 मई को वो दरभंगा पहुंची। रास्ते में बहुत सी रूकावटें आईं लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

मोहन पासवान गुरूग्राम में बैटरी रिक्शा चलाते थे, लेकिन जनवरी में एक दुर्घटना में उनके पांव में चोट लग गई थी। जिसके कारण वह रिक्शा भी नहीं चला पा रहे थे। 8वीं क्लास में पढ़ने वाली ज्योति तबसे अपने पिता का ख्याल रख रही थी। उनके पास पैसे भी खत्म हो गए थे और खाने-पीने का सामान भी नहीं था। प्रशासन की ओर से कोई भी मदद नहीं मिल पा रही थी। ऐसे में ज्योति ने हिम्मत करके अपने पिता से दरभंगा चलने की बात की, लेकिन उन्होंने मना कर दिया।

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ज्योति ने बताया कि किसी तरह उसने अपने पिता को गांव चलने के लिए मना लिया। इसके बाद ज्योति ने 1200 रूपये की एक साईकिल खरीदी और दोनों बाप-बेटी निकल पड़े एक लंबे सफर पर। उसने बताया कि सफर के दौरान लोगों ने उसकी काफी मदद की। उसे जगह-जगह पानी और खाना लोगों द्वारा मिल जाता था, लेकिन घर जाने की इस जुनून में उसने न धूप देखी न छांव, भूखे प्यासे बस चलते रहे एक ही धुन में। आखिर 7 दिन बाद बाप-बेटी दरभंगा पहुंचे। 

मोहन पासवान ने बताया कि 'लाॅकडाउन के कारण वह कोई भी काम नहीं कर पा रहे थे और पैसा भी खत्म हो गया था। खाने-पीने की दिक्कत भी हो रही थी। एक तरफ मकान मालिक किराये को लेकर दबाव बना रहा था। पहले तो सोचा कि लाॅकडाउन खत्म होने पर कोई काम करके उसका किराया दे देंगे, लेकिन लाॅकडाउन बढ़ने से समस्या और बढ़ गई। खाने-पीने के साथ दवाई की भी जरूरत थी, पैसा था नहीं, जिसके कारण दवा भी बंद करनी पड़ी।'

उन्होंने बताया कि 'प्रशासन की तरह से राशन भी नहीं मिल पा रहा था। फिर मेरी बच्ची ने बोला पापा चलो बिहार चलते हैं। मैंने बोला बेटा मेरा वजन कोई 4-5 किलो तो है नहीं और ऊपर से 1200-1300 किलोमीटर जाना है। उसने बोला पापा हम लोग कभी साईकिल से तो कभी पैदल चलेंगे और अपनी मंजिल पर पहुंच जायेंगे। लोग तो पैदल ही जा रहे हैं। बस फिर क्या था हम लोग इस लम्बी यात्रा पर निकल पड़े और अपने घर पहुंच ही गये। मेरी बच्ची बहुत ही हिम्मत वाली है, मुझे इस पर गर्व है।'

 

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