वायदों के इस मरहम से क्या भर पाएंगे प्रवासी मजदूरों के जख्म?

Migrants

भारत में लॉकडाउन हुए पूरे 54 दिन हो गये हैं और उम्मीद यही है कि 31 मई तक फिर से लॉकडाउन में ही रहना पडे़गा। पूरा देश संकट की स्थिति से गुजर रहा है। केन्द्र और राज्य सरकारों के प्रयास भी नाकाफी साबित हो रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि स्थिति पूरी तरह से हाथ से निकलती जा रही है। सारी इंडस्ट्री ठप्प पड़ी है। प्रवासी मजदूर शहरों को छोड़कर अपने घर की ओर पलायन कर रहे हैं।

कुछ राज्यों में तो इन प्रवासी मजदूरों को जबरदस्ती ट्रकों और टैम्पों में सामान की तरह भरकर वापस भेजा जा रहा है। चिंता यह भी है कि अगर इनमें से किसी एक को भी कोरोना हुआ तो बाकी लोग भी इससे प्रभावित हो सकते हैं, क्योंकि जब इन्हें भेजा जा रहा है तो सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं किया जा रहा है।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या सरकार जो इतने भारी-भरकम पैकेजों की घोषणा कर रही है उससे इन प्रवासी मजदूरों को फौरी राहत मिल सकेगी? क्योंकि अगर लाॅकडाउन से कोई सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ हैं तो वो हैं ये प्रवासी मजदूर।

लाॅकउाडन में इनकी तो गाड़ी ही पटरी से उतर गई है। उनके सामने रहने की ही समस्या नहीं है, खाने-पीने का संकट भी खड़ा हो गया और उन्हें कमाई का भी कोई जरिया नहीं दिख रहा है। इसी वजह से वह अपने-अपने गांवों की ओर पलायन कर रहे हैं। पलायन करने वाले मजदूर हादसों का शिकार हो रहे हैं। लाॅकडाउन के दौरान 100 से ज्यादा प्रवासी मजदूरों ने अपनी जान से हाथ धोया है और न जाने कितने घायल अवस्था में अस्पताल में पड़े हैं।

सरकार को लाॅकडाउन से पहले ये सोचना चाहिए था कि अगर सब कुछ बंद कर दिया जाएगा, तो इसका गरीब तबके पर क्या असर पड़ेगा। ये लोग कहां रहेंगे और क्या खायेंगे और नहीं तो इन बेचारों को इनके गांव पहुंचाने की कोई ठोस व्यवस्था तो करनी ही चाहिए थी। वैसे इस तबके में ऐसे लोग आते हैं जो रोज कमाते हैं ताकि उनको दो वक्त की रोटी नसीब हो सके। उनकी सिर्फ एक ही लड़ाई है- दो जून रोटी।

इनमें रिक्शा चलाने वाले, जो पूरे दिन हाड़तोड़ मेहनत करते हैं ताकि शाम को उन्हें भूखा न सोना पड़े। वही रिक्शा उनका घर होता है, जहां भी जगह मिल जाती है वहां पर ही रूक जाते हैं और खाना बना लेते हैं या किसी सस्ते से ढाबे से खरीदकर खा लेते हैं और उसी रिक्शे पर ही सो जाते हैं। 

एक तबका दिहाड़ी मजदूरों का है, जो रोज सुबह काॅलोनी के किसी चैक पर जमा होता है। ठेकेदार आता है और उनमें से कुछ मजदूरों को चुनकर ले जाता है। उनसे वो जी-तोड़ मेहनत करवाता है और शाम को उस कमरतोड़ मेहनत के बदले उन्हें मिलता है वो राशि इतनी होती है, जिससे बामुश्किल ही उनका गुजारा चल सके।

कुछ प्रवासी मजदूर कारखानों में काम करते हैं, उसके बदले उन्हें महीने में जो पगार मिलती है, वो सरकार द्वारा दिशानिर्देशित न्यूनतम दिहाड़ी (Minimum Wages) से भी कम होती है। आज हमें आजादी मिले लगभग 72 साल हो गये हैं, लेकिन सरकार अभी तक दिहाड़ी मजदूरों के लिए कोई ठोस कानून नहीं बना पाई और जो कानून बनाए भी हैं तो उसे सख्ती से लागू नहीं करवा पाई।

और भी न जाने कितने गरीब मजदूर होंगे, जो जीवन की इस जद्दोजहद में पिस रहे हैं। उनकी सुनने वाला कोई नहीं है। न तो प्रशासन में ही उनकी सुनवाई है और न सरकार में। नेताओं को भी उनकी याद तभी आती है जब चुनाव होते हैं। चुनाव के दौरान उनकी खाने के साथ पीने की भी व्यवस्था कुछ वोट के लालची नेता कर देते हैं। लेकिन अब न तो कोई चुनाव है और न ही कोई रैली। तो आखिर कौन है इन लोगों को पूछने वाला? क्या उनके लिए सरकार को कोई ठोस व्यवस्था नहीं करनी चाहिए? 

दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और न जाने कितने राज्यों से ये प्रवासी मजदूर पलायन कर रहे हैं। प्रशासन या सरकार की तरफ से जब सब व्यवस्थायें फेल हो गई, तो सब लोग पैदल ही अपने घर की तरफ निकल पड़े। न तो उनके पास खाने के लिए कुछ है और न ही कुछ नगद है कि वो कुछ खरीदकर खा सकें। कई तो अपने पूरे परिवार, औरतों और बच्चों के साथ जा रहे हैं। पैदल चल-चलकर उनके पावों में छाले हो गये हैं, जहां भी थक जाते हैं वहीं पर सो जाते हैं। 

पुलिस उनको बार्डर पर रोक रही है। प्रशासन की ओर से न तो रूकने के लिए कोई व्यवस्था है और न ही उनके खाने-पीने की। वैसे प्रशासन को भी उम्मीद नहीं थी कि ये मजदूर इतनी संख्या में एक साथ बार्डर पर आ जायेंगे। थके-हारे ये मजदूर भूख से बेहाल हैं, लेकिन जब ये लोग खाने की मांग करते हैं तो उनको मिलती हैं पुलिस की लाठियां। 

आखिर प्रशासन और सरकार की जिम्मेदारी है क्या? क्या सिर्फ भाषणों से पेट भरना पड़ेगा इन गरीब मजदूरों को? क्या ये इस देश के नागरिक नहीं हैं, और अगर हैं तो सरकार की इन लोगों के प्रति क्या जिम्मेदारी बनती है? टीवी पर बड़े-बड़े पैकेजों की घोषणा करने से क्या इन गरीब मजदूरों की समस्या का समाधान हो जाएगा या इसके लिए कुछ जमीनी कार्य भी सरकार को करना पड़ेगा?

Comments   

0 #1 Mansi Sharma 2020-05-21 18:53
nice news. eise hi news dete rahe laatsaab
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