हरियाणा भाजपा को कितना संबल दे पायेगी नगर निगम चुनावों की जीत?

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हरियाणा की जींद विधानसभा सीट के चुनाव 28 जनवरी को होने घोषित हो चुके हैं। जनवरी के अंतिम दिन आने वाला चुनाव परिणाम सत्तासीन भाजपा को दिसम्बर में हुए नगर निगम चुनाव परिणामों सा उत्साह देगा या इन चुनावों से मिले उत्साह को झटक देगा, यह अभी समय के गर्भ में ही निहित है।

उल्लेखनीय है कि तीन राज्यों–राजस्थान, मध्यप्रदेश तथा छत्तीसगढ़ में भाजपा को मिली हार से मायूस हो चुकी भाजपा और इसके धरातल स्तर के कार्यकर्ता हरियाणा में नगर निगम चुनावों में मिली अप्रत्याशित जीत से गदगद हैं और दावे करने लगे हैं कि अब वर्ष 2019 में होने वाले विधान सभा तथा लोक सभा चुनावों में भी पार्टी इसी दमखम के साथ सीटें जीतेगी। 19 दिसम्बर को घोषित परिणामों ने भाजपा को पांचों नगर निगमों के चुनावों में एक तरफा जीत देकर भाजपा में उत्साह का नया रक्त संचरण कर दिया है। प्रदेश में पहली बार हुए मेयर के डायरेक्ट चुनावों में भाजपा ने पांचों निगमों में भारी अंतर से मेयर के सभी पदों को हथिया कर सिद्ध कर दिया है कि आज भी शहरी क्षेत्रों में उसकी पकड़ मजबूत बनी हुई है।

भाजपा ने पांच नगर निगम–रोहतक, करनाल, पानीपत, हिसार तथा यमुनानगर के मेयर के पांचों तथा पार्षद के 110 वार्डों में 63 पार्षद जीतकर विरोधी पार्टियों को धराशायी कर दिया तथा उनके आगामी 2019 के विधान सभा एवं लोकसभा चुनावों में भाजपा की करारी हार के आंकलन को रद्द कर दिया। पानीपत की भाजपा मेयर अवनीत कौर, जो केवल 25 वर्ष 9 माह की हैं, ने तो अपने निकटतम कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार अंशु कौर को 74940 मतों के भारी अंतर से हराकर कांग्रेस को उसकी जड़ें दिखा दी। अवनीत कौर को 126321 तथा अंशु कौर को 51381 मत मिले। इन पांचों नगर निगमों में 110 वार्ड पार्षद के चुनावों में भाजपा को 63, कांग्रेस समर्थित को 11, इनेलो –बसपा गठबंधन को 3 तथा निर्दलीय को 33 पार्षद मिले।

कितने महत्वपूर्ण है नगर निगम के ये चुनाव भाजपा की निगाह में?

हाल के तीन राज्यों के चुनाव में हार के बाद हरियाणा के नगर निगम चुनाव भाजपा नेताओं की कितने महत्वपूर्ण हैं इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि खुद प्रधान मंत्री मोदी, अमित शाह, जयराम ठाकुर, वीरेंदर सिंह रावत तथा अरुण जेटली जैसे केन्द्रीय व बाह्य नेताओं ने भी हरयाणा भाजपा को इस जीत के लिए बधाई दी है।

नरेंदर मोदी ने ट्वीट किया –“ मै हरियाणा भाजपा टीम का जन कल्याण के लिए पूरे श्रम से किये गये कार्य की सराहना करता हूँ। मनोहर लाल खट्टर के नेतृत्व में प्रदेश की सरकार द्वारा भ्रष्टाचार –मुक्त और लोक-हितेषी प्रशासन दिया जा रहा है। भाजपा के विकास के एजेंडा को सर्वत्र सराहा जा रहा है। ”

अरुण जेटली ने हरियाणा भाजपा को बधाई देते हुए कहा-“ हरियाणा म्युनिसिपल चुनावों में क्लीन स्वीप के लिए हरियाणा भाजपा को बधाई। भाजपा के सभी पांच मेयर्स को चुनने तथा भाजपा में विश्वास प्रकट करने हेतु हरियाणा की जनता का आभार। ”

भाजपा ने खेला जातीय कार्ड

राजनैतिक विचारक मानते है कि भाजपा ने इन नगर निगम चुनावों में जातीय कार्ड का खुलम –खुल्ला प्रयोग किया है और इन में जहाँ पंजाबी विधायक थे वहां दूसरी जातियों को तथा जहाँ अन्य जाति का विधायक था वहां पंजाबी जाति के उम्मीदवारों को मेयर के प्रत्याशी बनाये गये। भाजपा को फायदा यह रहा कि गत 2014 के विधानसभा चुनावों में इन पांचों नगर निगम क्षेत्रों में भाजपा के ही विधायक जीत कर आये थे। आगामी विधानसभा चुनावों में केजरीवाल फैक्टर को ध्यान में रखकर बनिया जाति को पहले ही भाजपा के साथ जोड़ने का कार्य किया गया ताकि बनिया जाति किसी भी तरह केजरीवाल के साथ ना जाये। हिसार से विधायक कमल गुप्ता (बनिया) थे तो वहां पंजाबी उम्मीदवार गौतम सरदाना को मेयर पद पर उतारा गया, रोहतक में विधायक मनीष ग्रोवर पंजाबी थे तो मेयर के लिए बनिया वर्ग से मन मोहन गोयल को तथा करनाल में जहाँ स्वयं मुख्यंत्री मनोहर लाल खट्टर (पंजाबी) थे तो वहां बनिया उम्मीदवार रेणु बाला गुप्ता को मेयर के लिए मैदान में लाया गया। करनाल में तो बाकायदा अखबारों में विज्ञापन देकर जातीय मुद्दे को उछालकर चुनाव आचार संहिंता का खुलम-खुल्ला उल्लंघन करते हुए चुनाव लड़ा गया।

सोलह दिसम्बर को हुए पांच नगर निगमों के चुनावों में भाजपा के करनाल नगर निगम के चुनाव प्रत्यासी की फोटो सहित ठीक चुनाव के ही दिन एक राष्ट्रीय हिंदी समाचार पत्र में प्रकाशित करवाए गये इस विज्ञापन (विज्ञापन संलग्न) को देखा जाए तो भाजपा के प्रत्याशी की जातीय आधार पर वोटर के बंटवारे की मंशा साफ़ दृष्टिगोचर हो गयी। विज्ञापन, जिस पर भाजपा का चुनाव चिन्ह ‘कमल का फूल’, प्रधानमंत्री नरेंदर मोदी तथा हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर (जो पंजाबी समुदाय से सम्बन्ध रखते हैं तथा अपने हर सरकारी विज्ञापन में ‘हरियाणा एक –हरियाणवी एक’ का स्लोगन अंकित करवाते हैं), राष्ट्रीय हिंदी दैनिक अमर उजाला में ठीक चुनाव के दिन (सोलह दिसम्बर) प्रकाशित करवाया गया था। विज्ञापन में भाजपा को वोट देने का अनुरोध किया गया और लिखा गया-बीजेपी को वोट दें-क्योंकि, “52 साल में मिला हरियाणा का पहला पंजाबी मुख्यमंत्री। अगर आज गलती की तो साठ साल में फिर मौका नहीं मिलेगा। आज़ाद प्रत्याशी के कंधे पर बन्दूक रखकर पंजाबी समाज के मुख्यमंत्री को हटाना चाहते हैं कुछ जाति विशेष के नेता। पंजाबी समाज के लोगों का अनुरोध–पंजाबी मुख्यमंत्री का खुलकर करें समर्थन।”

इस विज्ञापन पर कुछ प्रश्न भी उठे कि क्या करनाल नगर निगम के मेयर पद की उम्मीदवार रेणु बाला गुप्ता की फोटो समेत ठीक चुनाव के दिन प्रकाशित इस विज्ञापन में जातीय आधार पर वोटों की मांग क्या चुनाव आचार संहिता का खुलम खुल्ला उल्लंघन नहीं है? क्या यह जातीय विद्वेष को बढ़ावा देने वाला तथा जातीय आधार पर वोट माँगने का सीधा सीधा मामला नहीं है? क्या यह सब प्रदेश के मुख्यमंत्री तथा करनाल से ही विधायक मनोहर लाल खट्टर के ध्यान में लाये बिना ही प्रकाशित करवाया गया है और किस के द्वारा छपवाया गया है? यदि भाजपा या भाजपा प्रत्याशी ने यह विज्ञापन नहीं छपवाया है, तो क्या भाजपा तथा भाजपा प्रत्याशी इस कथित जातीय जहर फैलाने वाले विज्ञापन प्रकाशन की जांच करवाएगी? क्या इस विज्ञापन पर चुनाव आयोग कोई संज्ञान लेकर जांच कारवाई करेगा या आँखे मूंदकर इग्नोर कर देगा?

भाजपा दे रही है गैर जाटवाद को तरजीह

हरियाणा के वर्तमान माहौल में जाट सबसे ज्यादा बिखराव की स्थिति में हैं। रोहतक के आस पास के जाट पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंदर सिंह हुड्डा के साथ आने में अपना हित समझ रहे हैं, वहीँ गत 2014 के चुनावों में कांग्रेस से पाला बदलकर भाजपा का दामन थाम केंद्र में मंत्री पद हथियाने वाले बिरेंदर सिंह के समर्थक भाजपा में ही रहकर सत्ता की मलाई चाटने में मशगूल हैं तो दूसरी तरफ पूर्व उप-प्रधानमंत्री चौधरी देवी लाल के वंशज दो भागों में विभक्त होकर अपने आप को जाटों का सबसे बड़ा मसीहा सिद्ध करने में लगे हुए हैं। इन जाट नेताओं की व्यक्तिगत लालसा के चक्कर में प्रदेश के जाट तीन –तेरह होकर रह गये हैं और इस हालत में आ गये हैं कि उनके वोट बैंक का अंतिम प्रभावी रिजल्ट शून्य की स्थिति में आ गया है। यही वो स्थिति है जो प्रदेश भाजपा को सर्वाधिक सूटेबल है और इसी को बनाये रखने हेतु भाजपा जाटों को महत्व न देकर गैर-जाटों को छाती से लगाना चाहती है। भाजपा की यह सोची समझी रण नीति इस बात से भी जाहिर होती है कि भाजपा ने हाल के इन नगर निगम चुनावों में मेयर पद पर किसी भी जाट को टिकेट नहीं दी और रोहतक, जो जाटों का गढ़ माना जाता है, में भाजपा ने कुल 22 पार्षद पदों पर किसी भी जाट को अपना उम्मीदवार नहीं बनाया, यह अलग बात है कि यहाँ 9 जाटों ने भाजपा के उम्मीदवारों को हराकर जीत हासिल की।

राजनैतिक विश्लेषक मानते हैं कि भाजपा का जाट-गैर जाट का विभाजन का मुद्दा कोई अभी नगर निगम चुनाव के समय पैदा हुआ मुद्दा नहीं हैं। यह भाजपा द्वारा सुनियोजित ढंग से प्रारम्भ से ही चलाया जा रहा अभियान का एक हिस्सा है। भाजपा के कुरुक्षेत्र से सांसद राज कुमार सैनी पिछले चार साल से ही जाट-गैर जाट की राजनीति कर रहे हैं और भाजपा अपने इस सांसद की कृत्यों के प्रति आँख बंद किये हुए है, यह कोई पार्टी की बेबसी नहीं बल्कि एक सूझ-बूझ की राजनीति का अंग है। दूसरी तरफ जाट आरक्षण के नाम पर आन्दोलन कर रहे यशपाल मलिक के क्रियाकलाप को भी कुछ जाट नेता भाजपा की ही सब्सिडियरी के रूप में देख रहे है और यह इस बात से भी पुख्ता होता है कि भाजपा सरकार में शामिल केन्द्रीय मंत्री बिरेंदर सिंह द्वारा यशपाल मलिक के सर पर पूरा हाथ रखा हुआ है तथा वे मलिक के हर आयोजन में शामिल हो सरकार में मंत्री पद का जूस पीते हुए भी समय समय पर सरकार के खिलाफ अपनी भडास निकाल कर जाटों के प्रति हमदर्दी जताते रहते हैं ताकि जाट वोटर्स को बहकाकर अपने पाले में रखा जा सके।

बेमेल गठबंधन भी नहीं दिला पाए जीत

विपक्षी पार्टियों ने पार्टी लाइन से हटकर भी गठबंधन और सहयोग किया फिर भी नगर निगम चुनावों में कामयाबी नहीं मिली पाई। कांग्रेस पार्टी ने वर्तमान प्रदेश पार्टी अध्यक्ष अशोक तंवर तथा पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंदर सिंह हुड्डा के मतभेद के चलते पार्टी सिंबल पर मेयर का चुनाव नहीं लड़ा और अपने स्थानीय स्तर पर निर्दलीय प्रत्यासियों को समर्थन दिया और चार निगमों में दूसरे स्थान पर रहे। इनेलो तथा बसपा गठबंधन ने पांचों निगमों में मेयर के लिए उम्मीदवार मैदान में उतारे परन्तु हार का मुंह देखना पड़ा। करनाल (60612- सेकंड पोजीशन), रोहतक (32775-थर्ड पोजीशन), यमुनानगर (32315-थर्ड पोजीशन), हिसार (2536 –छठी पोजीशन) तथा पानीपत (7309-चौथी) पोजीशन लेकर अपनी मौजूदगी दर्शाई। सबसे ज्यादा शर्मिंदगी की स्थिति इनेलो के लिए हिसार में रही जहाँ से इनेलो से अलग हुई नयी जननायक जनता पार्टी के नेता सांसद हैं परन्तु इनेलो को अपने सांसद के अलग हो जाने का कितना खामियाजा भुगतना पड़ा है ये उसके प्राप्त वोटों (केवल -2536) से स्पष्ट है। हिसार में राजनैतिक रूप से दो विपरीत घरानों (ओमप्रकाश जिंदल परिवार तथा भजनलाल परिवार) के एक मंच पर आने के बावजूद कांग्रेस को हार देखनी पड़ी। करनाल में अजीब बेमेल गठबंधन ने सांझे उम्मीदवार पर दांव लगाया पर हार गये। यहाँ इनेलो के साथ गठबंधन में बसपा ने अपना उम्मीदवार खड़ा किया जिसे कांग्रेस ने भी समर्थन दिया परन्तु नहीं जीत पाए। हाँ, इतना अवश्य हुआ कि खुद प्रदेश के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के विधान सभा क्षेत्र के इस चुनाव में भाजपा का उम्मीदवार जातिगत विज्ञापन प्रकाशित करवाने के बावजूद पांचों निगमों में सबसे कम अंतर (9348वोट्स का अंतर) से जीत पाया। यह खुद खट्टर के लिए खतरे की घंटी साबित हो सकती है।

क्या होगा इस चुनाव का असर?

हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंदर सिंह हुड्डा कहते हैं कि इन स्थानीय निकाय चुनावों का प्रदेश में आगामी विधान सभा व लोक सभा चुनावों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। ये स्थानीय स्तर के चुनाव हैं इनमे चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति की छवि ज्यादा काम करती है, वैसे भी कांग्रेस पार्टी ने पार्टी सिंबल पर चुनाव नहीं लड़ा था फिर भी रोहतक में भाजपा से ज्यादा कांग्रेस समर्थित पार्षद विजयी हुए हैं। हुड्डा ने ई वी एम पर भी सवाल उठाये हैं।

इनेलो, जिसने प्रदेश में बसपा से गठबंधन किया हुआ है, के विधानसभा में विपक्ष के नेता विधायक अभय सिंह चौटाला कहते हैं कि म्युनिसिपल कारपोरेशन के चुनावों ने दिखा दिया है कि उनकी ग्रामीण जड़ों वाली पार्टी का भी शहरी क्षेत्र में उल्लेखनीय वोट बैंक बढ़ा है। वे कहते हैं कि जहाँ कांग्रेस पार्टी सिंबल पर चुनाव लड़ने से ही घबरा गयी, वहीँ भाजपा का वोट बैंक खिसकता जा रहा है। नतीजन इनेलो 2019 के चुनावों में जीत की तरफ रफ़्तार पकड़ रही है। इनेलो से टूट कर बनी नवगठित पार्टी जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) के सर्वेसर्वा सांसद दुष्यंत चौटाला, जिन्होंने इन म्युनिसिपल कारपोरेशन चुनावों में पार्टी स्तर पर कोई भाग नहीं लिया था, काव्यात्मक भाषा में भाजपा की इस जीत को खाली मैदान की जीत करार देते हुए चुनौती देते हैं –“जुल्मो का हिसाब करना अभी बाकी है,

हवाओं के भी पर कतराना बाकी है,           

मत इतरा खाली मैदान की जीत पर,

अभी युवाओं का रण में उतरना बाकी है।”

पर राजनेता कुछ भी कहते रहें वास्तविकता यह है कि तीन प्रदेशों में हार के बाद भाजपा पार्टी के नेता व कार्यकर्ता हताशा से उबर नहीं पा रहे थे, इस चुनाव परिणाम ने उनके हौंसले बुलंद कर दिए हैं और इतना तो निश्चित भी कर दिया है कमजोर और अपनी डफली अपना राग वाले विपक्ष के मुकाबले शहरी क्षेत्रों में भाजपा का जनाधार भी पुष्ट कर दिया है। अगर कांग्रेस में यूँ ही धड़ेबाजी चलती रही और इनेलो और इससे टूट कर बनी जे जे पी भाजपा से लड़ने की बजाय आपस में एक दूसरे को हराने का प्रबंध करने में लगी रही तो भाजपा को दोबारा सत्ता में आने से शायद ही कोई रोक पाये।

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