महागठबंधन का गणित, लोकसभा चुनाव में क्या होगा इसका असर !

लोकसभा चुनाव

पांच राज्यों के चुनाव नतीजों के बाद स्वाभाविक रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के घोर आलोचक हालिया जनादेश के बाद इस नतीजे पर पहुंच गए हैं कि देश में मोदी लहर खत्म हो चुकी है और वर्तमान केंद्र सरकार की उलटी गिनती शुरू हो गई है। उनका आकलन है कि 2014 के आम चुनाव में भाजपा को जिस प्रकार मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की कुल 65 लोकसभा सीटों में से 62 पर जीत हासिल हुई थी, वह इन्हीं प्रदेशों के चुनावों में पराजय के बाद घटकर 31 रह जाएंगी। इस गणित के पीछे वह तर्क देते है कि इन राज्यों में भाजपा को 180 विधानसभा सीटों का नुकसान तो कांग्रेस को 163 विधानसभा सीटों का लाभ हुआ है। अब यदि ऐसा होता है तो भाजपा की हार निश्चित है। क्या यह आकलन भारतीय चुनावी इतिहास से मेल खाता है?

पूर्वोत्तर भारत से कांग्रेस का सफाया 

निर्विवाद रूप से भाजपा पांच राज्यों में से किसी भी प्रदेश में सरकार नहीं बना सकी है। कांग्रेस जहां हिंदू पट्टी के तीन बड़े राज्यों में वापसी करने में सफल हुई है, तो मिजोरम में हार के साथ उसका पूर्वोत्तर भारत में सफाया हो गया है और तेलंगाना में भी उसे भारी पराजय का सामना करना पड़ा है। क्या जनता का भाजपा से वाकई मोहभंग हो गया है?

मध्य प्रदेश व राजस्थान में मामूली अंतर

लोकसभा में 29 सांसद भेजने वाले मध्य प्रदेश में भाजपा अपनी निकटतम प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस से लगभग 48 हजार मत अधिक पाने के बावजूद सरकार नहीं बना पाई। इसके उलट 2013 में भाजपा को यहां निर्णायक विजय प्राप्त हुई थी। तब उसे 44.8 प्रतिशत मत मिले थे, जबकि कांग्रेस को 36.38 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे। इसी तरह 25 लोकसभा सीटों वाले राजस्थान के विधानसभा चुनाव में विजय का अंतर बहुत कम रहा है। कांग्रेस को यहां 39.3 प्रतिशत मत मिले हैं जो भाजपा के 38.8 प्रतिशत से केवल 0.5 प्रतिशत अधिक था।

छत्तीसगढ़ भाजपा के लिए चिंता का विषय

निश्चित रूप से 11 लोकसभा सीटों वाले छत्तीसगढ़ का परिणाम भाजपा के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि वहां पार्टी 2013 की तुलना में 41 प्रतिशत मत के स्तर से घटकर इस बार 33 प्रतिशत पर आ गई, जबकि कांग्रेस का वोट 40.3 प्रतिशत से बढ़कर 43 प्रतिशत हो गया।

मप्र, छत्तीसगढ़ व राजस्थान में भाजपा पूरी तरह खारिज नहीं

स्पष्ट है कि इन तीन हिंदी भाषी राज्यों के मतदाताओं ने भाजपा को पूरी तरह खारिज नहीं किया है-जैसा कि कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों और मीडिया के एक हिस्से द्वारा दावा किया जा रहा है। क्या यह सत्य नहीं कि प्रत्येक चुनाव का अपना एक विशिष्ट भाव, दृष्टिकोण और निहितार्थ होता है?

कांग्रेस शासित दिल्ली में लोकसभा की सभी सीट जीती थी भाजपा

मार्च 1998 के लोकसभा चुनाव में भाजपा 182 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी और कांग्रेस की संख्या घटकर 141 रह गई थी। उसी वर्ष के अंत में दिल्ली, राजस्थान और मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनावों में भाजपा पराजित हो गई। इसके चार माह बाद अप्रैल 1999 में वाजपेयी सरकार एक वोट से विश्वासमत हार गई। देश में पुन: संसदीय चुनाव हुए जिसमें भाजपा फिर जीत गई। पार्टी ने तब कांग्रेस शासित दिल्ली की सभी सात लोकसभा सीटों पर भी विजय हासिल की थी और शेष हिंदी भाषी राज्यों में भी उसने अच्छा प्रदर्शन किया था।

विधानसभा चुनाव जीतने के बाद भी लोकसभा चुनाव हार गई थी भाजपा

दिसंबर 2003 में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने विजय प्राप्त की। पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इन चुनाव नतीजों का लाभ संसदीय चुनावों में उठाना चाहता था, इसलिए उसने 2004 में लोकसभा भंग कर पांच माह पहले ही आम चुनाव करवा दिए। किंतु भाजपा हार गई। इसी तरह, दिसंबर 2008 में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में भाजपा जीती थी, किंतु 2009 के संसदीय चुनाव में फिर पराजित हो गई। दिसंबर, 2013 में दिल्ली में नवगठित आम आदमी पार्टी सरकार बनाने में सफल हुई। किंतु पांच महीने बाद लोकसभा चुनाव में यहां की सभी सीटें भाजपा जीत गई।

तेलंगाना में फूट गया ‘महागठबंधन’ रूपी बुलबुला

तेलंगाना विधानसभा चुनाव के परिणाम से स्पष्ट है कि विपक्षी दलों का ‘महागठबंधन’ रूपी बुलबुला फूट गया है। यहां कांग्रेस और तेलुगु देसम पार्टी यानी तेदेपा आशान्वित थे कि उनका महागठबंधन सत्तारूढ़ तेलंगाना राष्ट्र समिति को सत्ता से हटा देगा, किंतु के चंद्रशेखर राव का दल 119 सदस्यीय विधानसभा में न केवल पहले से अधिक 88 सीटें अर्जित करने में सफल हुआ, अपितु उसने 46.9 प्रतिशत मत भी प्राप्त किए। कांग्रेस 28.6 प्रतिशत मत के साथ 19 तो तेदेपा 3.5 प्रतिशत मतों के साथ दो सीटों पर सिमट गई।

हालिया चुनाव परिणामों से कांग्रेस अति-आत्मविश्वासी

इन चुनाव परिणामों का दुष्प्रभाव आगामी लोकसभा चुनाव में विपक्ष-विशेषकर महागठबंधन के पैरोकारों पर पड़ा है। इन परिणामों से पहले कांग्रेस छोटे राजनीतिक दलों के दवाब में थी और अपने हितों से समझौता करने को भी तैयार थी। किंतु हालिया चुनाव में अपने प्रदर्शन के बाद अति-आत्मविश्वासी और अति-उत्साही हो चुकी है। 16 दिसंबर को चेन्नई में द्रमुक मुखिया एमके स्टालिन ने जैसे ही कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को विपक्ष के भावी प्रधानमंत्री उम्मीदवार के रूप में प्रस्तुत किया तो इससे प्रस्तावित महागठबंधन के प्रमुख धड़ों के नेताओं की भृकुटियां तन गईं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस, माकपा महासचिव सीताराम येचुरी और समाजवादी पार्टी मुखिया अखिलेश यादव सहित अन्य विपक्षी नेताओं ने स्टालिन के विचार को तुरंत खारिज भी कर दिया।

मोदी विरोधी गठबंधन आकार लेने से पहले ही दरकने के आसार

भावी मोदी विरोधी महागठबंधन के आकार लेने से पहले ही दरकने का एक कारण यह भी है कि जिस बसपा ने मध्य प्रदेश और राजस्थान में बहुमत से दूर कांग्रेस को समर्थन देने की घोषणा की थी, उसकी मुखिया मायावती तीन राज्यों में कांग्रेसी सरकारों के शपथ ग्रहण समारोह में विपक्षी नेताओं की एकता दिखाने वाले जमघट से दूर रहीं। अखिलेख यादव भी इसमें शामिल नहीं हुए। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो बसपा-सपा उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को केवल दो-तीन सीट देना चाहती हैं। क्या अपने हाल के प्रदर्शन से उत्साहित कांग्रेस इससे संतुष्ट होगी? वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में एक सुखद बात यह रही कि मध्य प्रदेश में कमलनाथ और राजस्थान में अशोक गहलोत के शपथ ग्रहण समारोह में पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और वसुंधरा राजे ने भी शिरकत की जो भारतीय लोकतंत्र के जीवंत और स्वस्थ होने का सूचक है।

अधिकांश विपक्षी नेताओं की महत्वाकांक्षा प्रधानमंत्री बनने की

वास्तविकता तो यह है कि राहुल, मायावती, ममता सहित अधिकांश विपक्षी नेताओं की महत्वाकांक्षा प्रधानमंत्री बनने की है। कांग्रेस, बसपा, सपा, तृणमूल सहित अधिकतर भाजपा विरोधी दलों का उद्देश्य वैकल्पिक दृष्टिकोण, नीतियां, विकास का प्रारूप और जनहित से जुड़ा न होकर विशुद्ध रूप से केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता में वापसी से रोकना है। यदि महागठबंधन आकार लेता है और दर्जन भर प्रधानमंत्री पद के संभावित दावेदारों के साथ लोकसभा चुनाव में उतरता है तब मतदाता नरेंद्र मोदी के समक्ष विपक्षी चेहरों को सामने रखकर क्या निर्णय करेंगे, इसका अनुमान लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं है।

(लेखक राज्यसभा के पूर्व सदस्य एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

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