बाघों के लिए कड़ी सुरक्षा की जरुरत

बाघों

हाल ही में एक आरटीआई द्वारा खुलासा हुआ है कि पिछले 10 वर्षों में शिकारियों ने 384 बाघों को मारा दिया। इस अपराध के लिए अब तक 961 लोगों को आरोपी भी बनाया है। डब्लयूसीसीबी द्वारा दी गई इस जानकारी से मन कचौटता है आखिर हम मुख्य व अहम जीव जंतुओं को भी नही बचा पा रहे है। भारत में राष्ट्रीय पशु के संरक्षण के लिए सरकार ने वर्ष 1973 में ‘टाइगर परियोजना’ लॉन्च की थी। 2014 के आंकड़ों के अनुसार, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की वेबसाइट के मुताबिक भारत में दुनिया में सबसे ज्यादा 2,226 बाघ हैं। ऐसी बातों से ही तय होता है कि हमारे पास आज भी वो चीजें हैं जो पूरे विश्व में नही हैं बावजूद इसमें इतनी लापरवाही का क्या कारण हो सकता है। सरकार चाहे किसी भी पार्टी रहे लेकिन इन मामलों में बजट की कभी कोई कसर नही छोड़ी जाती। यह विफलता तो पूर्ण रुप से वन विभाग व संबंधित क्षेत्र के पुलिसकर्मियों की लगती है। 2016 की एक रिपोर्ट के अनुसार पूरे विश्व में 3891 बाघ हैं जिनमें से 70 प्रतिशत केवल भारत में ही है। इस प्रतिशत से यह स्पष्ट हो जाता है कि पूरे दुनिया की अपेक्षा हमारे पास कितनी ज्यादा संख्या है। भारत के अलावा बंग्लादेश, मलेशिया व साउथ कोरिया में इसे राष्ट्रीय पशु घोषित किया हुआ है। कई अहम विशेषताएं के साथ इसकी विश्वविख्यात पहचान व अहमियत है जैसे कि यह बिल्ली की प्रजाति का सबसे बड़ा जानवर है व ध्रुवीय भालू और भूरे भालू के बाद सबसे ज्यादा मांस खाने वाला जीव माना जाता है। इसकी टांगे इतनी मजबूत होती है कि यह मरने के बाद भी कुछ देर खडा रह सकता है। इसके दिमाग का वजन 300 ग्राम होता है व सभी मांसाहारी जीवों मे दूसरा सबसे बड़ा जानवर होता है। एक बाघ अधिक से अधिक 300 किलो व 13 फीट का हो सकता है। सफेद रंग का बाघ दस हजार में से केवल एक के ही होने की आशंका होती है। बाघ के शरीर पर जो धारियां पाई जाती है वो मनुष्य के फिगंरप्रिंट की तरह यूनिक होती हैं। इसके अन्य कई विशेषताएं को मध्य नज़र रखते हुए 2010 से हर 29 जुलाई को ‘वर्ल्ड टाइगर डे’ की घोषणा भी हुई थी।

बहुत कम लोगों का यह जानकारी होगी कि पशु-पक्षी हमारे लिए बेहद जरुरी है। यह हमारे जीवन को सुरक्षित रखने में अहम भूमिका निभाते है। सबसे पहले आपको उदाहरण के तौर पर बताते हैं कि जितने भी पक्षी होते हैं वह छोटे छोटे कीड़ों खाते हैं जिससे हमारे अनाज से लेकर अन्य कई चीजों में सुरक्षा मिलती है। लेकिन अब पक्षी भी गायब हो रहें है जिसका कारण मोबाइल टॉवर है। टॉवरों से निकले वाली तरगों ने महानगरों में पक्षी की जातियों को पूर्णत खत्म कर दिया। आपको ज्ञात हो कि लगभग दो दशक पूर्व आपसे घर के आस पास कितनी प्रकार की चिडिया व अन्य तरह के पक्षी चहचाहते थे लेकिन अब ऐसा दृश्य बिल्कुल देखने को नही मिलता जो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण हैं। इस ही तरह कई बड़े पशु भी मानव जीवन को हानि पहुंचाने वाले कीड़े व जीव-जंतुओं को नाश करते हैं।

मनुष्य में अपनी तकनीकीकरण व विकास के लालच में प्रकृति का नाश करना शुरु कर दिया जिसका सबसे बड़ा व नकारात्मक उदाहरण यह दिखा कि महानगरों में मनुष्य की आयु केवल 60 से 65 वर्ष तक ही सिमित रह गई। हालांकि गांव के परिवेश में अभी आयु 80 से 85 वर्ष हैं क्योंकि अभी भी वहां प्रकृति बची है। बदलते परिवेश में हम लोगों ने अपनी जीवन प्रक्रिया को सरल तो बना लिया लेकिन इसके दुष्परिणाम भी बहुत जल्दी दिखने लगे। जिन बीमारियों के नाम भी नही सुने थे वो अब कम आयु में लोगो को घेरने लगी। अब तो लोगों ने अपनी जरुरतों का बहाना इस तर्ज पर कहना शुरु कर दिया कि “प्यास गजब की लगी थी और पानी में जहर था,पीते तो मर जाते और नही पीते तो भी मर जाते।’’ बहाने रोजना बढ़ रहे हो और उम्र कम होती जा रही है। यदि इन दुष्परिणामों को मध्यनज़र रखते हुए जल्द ही हमनें अहम निर्णय नही लिए या यूं कहें पुन प्रकृति को नही अपनाया तो मानव विनाश बहुत जल्द तय है।

बहराहल अब बाघ की सुरक्षा करना हमारा अहम उद्देशय है। शासन-प्रशासन को इस विषय में बेहद गंभीरता दिखाने की जरुरत है। अब बात यह समझने है कि 2008 से अब तक लगातार यूनस्को लगातर हमारे की धरोहरों अपनी निगाह बनाए हुए व 13 अस्पृश्य धरोहरों को मानवता अमूर्त सांस्कृतिक विरासतों की प्रतिनिधि लिस्ट मे स्थान दे चुका व आगे भी यह प्रक्रिया जारी है। यह हमारे लिए गर्व की बात है कि हम 195 देशों की संस्था हमारे देश के इतिहास व कलाओं को खोजकर हमें गर्वित महसूस करवा रही है। हमारे देश के हर राज्य में अलग अलग सैंकड़ों संस्कृतियां शुमार है। ऐसी कितनी बातें हमें गर्वित कराती हैं लेकिन हमारे देश को अपनी कीमत और वकत का अंदाजा नही है जिससे सजीव उदहारण यह है कि हमारे खुद के लोगों ने ही 10 वर्षों में 384 बाघो को मार दिया। लगभग हर चीज पुन: प्राप्त हो जाती है लेकिन कुछ नही। बाघ भी एक ऐसी प्रजाति है यदि एक बार पूर्णत खत्म हो गए तो इनको दोबारा देख पाना बेहद मुश्किल ही नही नामुमकिन होगा। इस विषय में शिकारियों कड़ी कार्यवाही के साथ बाघों के विषय में समझाया जाए व उनकी जानकारी को बढ़ाया जाए कि यह हमारे देश की अहम धरोहरों मे से एक हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)

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