पासवान के सामने बीजेपी के झुकने के बड़े मायने हैं

पासवान

सामान्यत: अपने सहयोगी दलों को घास न डालने के लिए बदनाम बीजेपी को रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के सामने यदि झुकना पड़ा है, तो इसका श्रेय खुद पासवान और उनके बेटे चिराग पासवान को जाता है, जिन्होंने अपनी बात मनवाने के लिए सही वक्त पर दबाव बनाया। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में अपनी सरकारें गंवाने के बाद बीजेपी का बैकफुट पर आना स्वाभाविक था और इसी दरम्यान जब बिहार में उपेन्द्र कुशवाहा ने बीजेपी के कथित `तानाशाही पूर्ण रूख के चलते एनडीए से नाता तोड़कर यूपीए का दामन थाम लिया तो पासवान के लिए बीजेपी पर दबाव बनाना आसान हो गया। दरअसल एनडीए में शामिल पासवान की पार्टी लोजपा को पिछली बार बंटवारे में बिहार की सात संसदीय सीटें मिली थी और उसने ये सभी सीटें जीती भी थी किंतु एनडीए में जेडीयू की वापसी से लोजपा को बंटवारे में फिर से सात सीटें मिलने के आसार कम हो गये थे। कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी को पिछली बार तीन सीटें मिली थी और उसने तीनों जीती थी लेकिन बीजेपी इस बार उसे सिर्फ एक सीट देने को तैयार थी। दरअसल इस पार्टी में दो फाड़ हो गये हैं और ऊपर से जेडीयू का दबाव था जिसके चलते बात नहीं बनी और नतीजा यह हुआ कि कुशवाहा ने एनडीए छोड़कर यूपीए का दामन थाम लिया। उधर शिवसेना पहले ही एनडीए से अलग चुनाव लडऩे का ऐलान कर चुकी है, ऐसे में पासवान ने मौका ताड़ा और दबाव बना दिया। पार्टी का संगठन चला रहे चिराग पासवान ने अचानक दो ट्वीट करके बीजेपी को चेतावनी दे दी। उन्होंने इसके अलावा बीजेपी से नोटबंदी के फायदे पूछे, राफेल डील पर जेपीसी गठित करने की कांग्रेस की मांग का समर्थन किया और तीन राज्यों में कांग्रेस की जीत के लिए राहुल की तारीफ भी की। इस तरह से उन्होंने बीजेपी को चेतावनी दे दी कि उनकी पार्टी को एक बार फिर पाला बदलने में कोई परेशानी नहीं होगी।

दरअसल रामविलास पासवान राजनीतिक मौसम के हिसाब से पाला बदलने में माहिर हैं। पासवान लगभग पचास वर्षों से विधायक या सांसद रहे हैं। इस बीच एक बार ही उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। 1989 में वीपी सिंह सरकार ने जैसे ही मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू की, पासवान राष्ट्रीय राजनीति के केन्द्र में आ गये। वे दलित नेता के रूप में उभरे और बिहार के कम से कम छह जिलों में उन्होंने दलित-मुसलमान समीकरण से अपने लिए निर्णायक वोट बैंक तैयार कर लिया। पासवान ने अपनी राजनीतिक यात्रा को राजनारायण, चौधरी चरण सिंह की शागिर्दी में एक समाजवादी के रूप में शुरू की थी पर बाद में उन्होंने सत्ता के लिए बार-बार रंग बदले। यह उनकी राजनीतिक चतुराई ही है कि 1996 से अब तक लगभग सभी सरकारों में मंत्री रहे। देवगौड़ा, गुजराल, अटल बिहारी बाजपेयी, डॉ. मनमोहन सिंह और अब मोदी सरकार में भी वे मंत्री बने हुए हैं। 2002 में गुजरात दंगों के विरोध में अटल जी की कैबिनेट छोड़ी और फिर यूपीए का दामन थामकर मंत्री बन गये। सत्ता के चलते उनकी समाजवादी सोच कब लुप्त हुई, पता ही नहीं चला। दलितों और मुस्लिमों, जिनके वोट बैंक से वे आगे बढ़े, के लिए उन्होंने कोई बड़ा काम किया हो, ऐसा वे नहीं बता सकते पर मौका परस्ती का कोई मौका उन्होंने हाथ से जाने नहीं दिया और इसी के चलते निर्धन परिवार में जन्मे पासवान आज निजी रूप से अत्यंत समृद्ध हैं। उन्हें ऊंचे रहन-सहन के लिए जाना जाता है। राजनीतिक चालाकियों और कपड़ों की तरह दोस्त-दुश्मन बदलने की उनकी कला के चलते ही लालू प्रसाद यादव ने उन्हें देश के सबसे बड़े `मौसम वैज्ञानिक’ की पदवी से नवाजा था।

तीन राज्यों में पराजय कई सहयोगी दलों के नाता तोडऩे और देश की बदलती राजनीतिक फिजां के मद्देनजर ही मोदी-शाह की अजेय जोड़ी को भी पासवान के आगे समर्पण करना पड़ा। चूंकि बीजेपी और जेडीयू पहले ही बिहार में 17-17 सीटें बांट चुके हैं, ऐसे में पासवान के लिए छह सीटें ही बचती थीं। टकराव की असली वजह भी यही बनी। अंतत: बीजेपी को रामविलास पासवान को अपने कोटे से राज्यसभा में भेजने का फैसला लेना पड़ा। शायद यह पहला मौका है जब बीजेपी पर उसका एक सहयोगी दल भारी पड़ गया। बीजेपी को यह गवारा नहीं था कि एक राज्यसभा सीट की खातिर वह बिहार में अपनी चुनावी संभावनाओं को दांव पर लगाये। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि बीजेपी बिहार से इतर अपने साथी दलों के साथ कैसा बर्ताव करती है। हालांकि आंध्र में टीडीपी का साथ छूटने के बाद बीजेपी नये दलों के साथ गठजोड़ बनाने के लिए उत्सुक हैं और अब पासवान प्रकरण के बाद दूसरे दलों के लिए भी मौका है कि वे बीजेपी के साथ अपनी शर्तों पर समझौता करें।

(Source: Webvarta)

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