मैं तो पंछी,पिंजरे की मैना पंख मेरे बेकार

मैं तो पंछी,पिंजरे की मैना पंख मेरे बेकार

दिन के लगभग दस बज रहे हैं। ठंड के दिनों के कारण‌ बाज़ार की जवानी आना अभी बाकी है। अलसाये से लोग चाय पानी की जुगाड़ में लगे हुए हैं। इस जुगाड़ में आगे बढते मेरी नजर अंबा से देव जाने वाली सङक पर एक जगह टिक सी जाती है। भोला गुप्ता की गल्ला दुकान उस जगह का लैंडस्केप है और गल्ला दुकान के सामने सङक किनारे बैठी एक बुढिया औरत अपना पोट्रेट तैयार करवा रही है। बुढिया की आयु लगभग 60–65 है । रंग काला है कांतिहीन बूझा-सा। बाल लगभग सफेद हो चुके हैं। उसकी पहनी हुई साङी, कह नहीं सकता कि कितनी जगह से फटी हुई हैं। पास जाने में संकोच है कि लोग क्या सोचेंगे … एक भीखारन से याराना ! नजदीक जाने में एक जोखिम भी है कि कहीं उसकी आंखें पूछ ना बैठे कि क्या देख रहे हो.. आदमी नहीं देखा क्या ! दूर से ही उसकी कई छवियों को कैमरे से कैद रहा हूं ताकि एक अच्छा-सा प्रवचन पन्ने पर उतार कर दिखा सकूं कि देखो मेरी संवेदनशीलता कि गहराई !

बुढिया सङक पर बिखरे और किनारे की मिट्टी में गङे धान को समेट रही है। धान में मिले कंकङ और मिट्टी को सूप से फटक रही है । शायद अपने जीवन से दुर्भाग्य को फटक-फटक कर अलग कर देना चाह रही है। उसे इस उम्र में भी अपने सफल हो जाने का भरोसा है। मिट्टी से उसकी मोहब्बत अनायास नहीं है। जहाँ दूसरे इस उम्र में रामनाम जपते हुए परलोक के सफर की तैयारी करना शुरू कर देते हैं वहीं वह औरत इहलोक की चिंता में घुले जा रही है। वह अभी भी वर्तमान से मुठभेङ कर रही है। भविष्य की चिंता की उसे जल्दबाजी नहीं है। जब किसी के अतीत वर्तमान सब एक से हों उसमें भविष्य के लिए ललक हो भी तो कैसे !
” मैं तो पंछी, पिंजरे की मैना पंख मेरे बेकार , बीच हमारे सागर , कैसे उङ चलू उस पार ।”

यह गरीबी और बेबसी का सौन्दर्य है कि बिना माइक लाउडस्पीकर के भी वह खाध सुरक्षा पर बल दे रही है। अकादमिक बहसों में यह मान लिया गया है कि देश की सारी आबादी को पौष्टिक तत्वों से युक्त मांग के अनुरूप पर्याप्त मात्रा में दीर्घ अवधि तक खाध सामग्री की पूर्ति किया जाना ही सही मायने में खाध सुरक्षा है। उधर पर्याप्त मात्रा में अन्न भंडार होते हुए भी लोग क्रय क्षमता के अभाव में अनाज खरीद नहीं पाते। मतलब यह रोजगार सृजन कर लोगों की क्रय शक्ति बढाने की जरूरत से भी जुङा हुआ है। सरकार मानती है कि खाध सुरक्षा में उसकी चार अवस्थाएं प्राप्त किया जाना भी जरुरी हैं। वे हैं – पर्याप्त खाध सामग्री की नियमित उपलब्धता, भोजन में दलहन का समावेश, तीसरी अवस्था में दलहन के साथ दुग्ध उत्पादों पर जोर तथा चौथी अवस्था में उपरोक्त के अलावा फल और मांस-मछली का समावेश । जब राजकर्मचारी रट रटाकर फिल्ड में भेजे जाते हैं तब वे बुढिया को भी कुपोषण के बारे में बताते होंगे तब उसे इतना ही समझ में आता होगा कि कुछ अंग्रेज़ी में बोल रहे हैं माई बाप। केवल विटामिन समझ पाती होगी… बीता-मन ! बीते हुए मन के कई दृश्य सामने से गुजरने लगते होंगे कि गरीबी हट जायेगी इंदिरा गांधी ने चिल्ला चिल्ला कर कभी उम्मीद जगाया था। …..तब उस नवयौवना के यौवन मन में एक सपने का तरंग होगा कि अपने पतिघर वह अपने बालपन में देखे अकाल भूखमरी से महफूज धान की कोठारे से अनाज निकाल पा रही है। मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हीरे मोती में से कुछ ‘सोना’ उसके ससुराल के आंगन में भी गिर रहा है। ….. पिता ,पति और पुत्र कोई उसकी कोठारे को भरने में सक्षम नहीं हो सके तो क्या हुआ उसके मन का कोठार आज भी खाली नहीं है। वह जीवित है, दूसरों को
जीवित रखने के लिए भी उसे जीवित रहना होगा। किसी नाती पोता के जीवनदीप की रक्षा करने का संतोष क्या कम है ! चालाक बुढिया भोलाजी से कम चतुर नहीं । दूसरों की मदद कर परलोक के लिए पुण्यार्जन वह भी कर रही है ….!

लगभग 5–7 किलो धान वह फटक चुकी है। इसे वह बेचेगी नहीं। उसने एक-एक कंकङ को निकाल फेंका है। वह अपने बच्चों को मिलावट रहित फ्रेश चावल खिलायेगी। सहारा क्यू शॉप जाने की औकात नहीं हुआ तो क्या …वह खुद ‘सहारा’ प्रोडक्ट बनाकर दिखायेगी। बच्चों को भरोसा है कि वह व्यापार के लिए नहीं चुनती बिनती नहीं तो नौ सौ ग्राम को किलो बनाना पङता उसे। …. बेचने का काम भोलाजी करते हैं। उनका कारोबार यही है। व्यावसायिक नैतिकता का यथासंमव पालन करते हैं वर्ना लक्ष्मी गणेश जी की पूजा करते वक्त उन्हें कौन-से मंत्र से प्रसन्न कर पायेंगे! ईश्वर तो रिश्वत लेते नहीं। भोलाजी को विरासत में पंसारीपन मिला है। दिनभर सङक पर वह बेचनीहारों का महफिल जमाये रखते हैं।
“मंसूरिया हई..साढे दस के किलो लेबुआ ।”
” ऐगारह के ना होतई हो …”
“ना भाई ,सगरो पता लगा लअ।”

भोलाजी को कोई एतराज नहीं कि उनके सामने जमीन पर गिरे अनाज को एक बुढिया चुन बिन रही है। भोलाजी के गुमाश्ता गया पाल ने बताया कि बुढिया पङोस के गांव मुङिला की है। गरीब है। मजदूरी पर धान नहीं चलवा रहे हैं । गिरल है …ले जाने दीजिए। एक संतोष है गया के चेहरे पर कि चलो सुबह सुबह कुछ अच्छा कर रहा हूं। व्यापार में एक एक रूपया पकङने की चाहत के सामने यह उदारता मन को तसल्ली देती है कि चलो कुछ बचाया जा रहा है शायद पुण्य ! जाते जाते बुढिया प्रसन्न दिख रही है। काली त्वचा के बीच कुछ दांतों ने बाहर झांका और फिर पट बंद कर लिये। थोङी देर की मेहनत से काम भर मिल गया है। बूढी हड्डियों के हिसाब से कम नहीं है। उसके लिए भोलाजी आज के लिए भोलेनाथ हैं। उसके लिए असली सरकार उनके जैसे कुछ औघङ ही होते हैं। घर जायेगी तो वहाँ भी कुछ फटकेगी और सरकार उसके भाग्य को बांचने के वास्ते चुनाव हरेक पांच साल पर पटकेगी ।

इस पोट्रेट में प्रयुक्त रंग प्राकृतिक हैं,कोई रसायन नहीं । रसायन मिलवाने की औकात उस बुढिया में है भी नहीं । मिट्टी का भी भला क्या कोई रंग होता है !! …ब्रश की जगह अंगुलियों का इस्तेमाल किया गया है। अनगढ चित्र का चित्रकार फोटोग्राफर कोई कलमबाज है और देखनीहार है समाज ।

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