कौन दिशा में लेके चला रे बटोहिया

गिरगिट भी किसी कीङे मकोङे को अपना भक्ष्य बनाने के लिए दांव पेंच लगाता है, किसी आसन्न खतरे को भांपकर अपने बचाव की कई युक्तियाँ भी आजमाता है लेकिन यह ज्ञान नहीं है। यह केवल जिंदा रहने की बुद्धि है। ज्ञान केवल मनुष्य अर्जित कर सकता है क्योंकि बुद्धि से आगे की चीज है। पशु पक्षी अपना पक्ष मनुष्यों को समझ में आ सकने वाली भाषा में हमारे समक्ष रखने में सक्षम नहीं हैं। हमारे मानदंड पर गढे गये परिभाषित और विकसित शिक्षा यदि उनके पास हों भी तो उनकी आंगिक वाचिक चेष्टाओं की हमसे भिन्नता अथवा भाषायी अवरोध एक बङी समस्या है जिसके अनुवाद की कोई तकनीक अब तक विकसित नहीं की जा सकी है और प्रकारांतर से यह अवरोध मनुष्य की ज्ञानी छवि के खिलाफ भी जाता है।

मनुष्य का बोध विकसनशील रहा है।
इंदिरा गांधी के शब्दों में “शिक्षा मानव को बंधनों से मुक्त करती है और आज के युग में यह लोकतंत्र की भावना का आधार भी है। जन्म तथा अन्य कारणों से उत्पन्न जाति एवं वर्गगत विषमताओं को दूर करते हुए मनुष्य को सबसे ऊपर उठाती है।” बङी बात है जो किताब और स्कूलों से हासिल नहीं हो सकता है। शिक्षा नौकरी दिलवा सकती है, विवाह के लिए बढिया वर-कनिया चुनने चुनाने में बढत दिला सकती है और व्यवहारों से भदेसपन दूर करते हुए थोङा रिफायन कर सकती है ताकि बोलना चलना आ जाये। यह ज्ञान तो नहीं है। बंधनों से मुक्ति ही ज्ञान है। इसको व्यापक अर्थों में ग्रहण करने पर आध्यात्मिक भावभूमि हासिल हो जाता है। सभी आध्यात्मिक स्तर तक नहीं पहुंच सकते यह भी तय है लेकिन सांसारिक जगत में विचरण करते हुए भी मनुष्य जाति,लिंग,धर्म की गैरजरूरी परंपराओं को तो छोङ ही सकता है। उदारता से आगे बढकर वस्तुनिष्ठता तक का सफर भी किसी हद तक तय कर ही सकता है।

अनपढ के विरूद्ध मनुष्य की पांच पहचाने हो सकती हैं।ये हैं साक्षर,शिक्षित,बुद्धिमान,विद्वान और ज्ञानी। न पचने वाली बात यह है कि अनपढ भी बुद्धिमान हो सकता है। अनपढ केवल यही बताता है कि सामनेवाला पढना लिखना नहीं जानता । कोई अकबर भी निकल आते हैं जो परिवेश की परख की गहरी अंतर्दृष्टि रख सकते हैं। ऋग्वेद कहता भी है “Let noble thoughts come to us from every side.” आदमी को सामाजिक , पारिवारिक और बौद्धिक संस्कार गढते हैं और यह बौद्धिक संस्कार अनिवार्य रूप से किसी शिक्षण संस्थान के मोहताज नहीं होते। मनुष्य के पास अन्य जीवों की तरह प्राप्त एक सेंस तो होता ही है जिसकी मदद से वह विविध स्रोतों से अपनी बुद्धि की कार्य शक्ति को बढाता जाता है। स्मरण के बल पर अपने अनुभूत सत्य , दूसरों के अनुभवों और किताबी शिक्षा को एक भंडार का रूप दे सकता है। यह भंडार मनुष्य,परिवार और समाज के आपसी अंत:क्रिया के द्वारा सदैव वृद्धिशील होती है। विद्वता विशेषज्ञता का परिणाम होता है। किताबी शिक्षा की कंठस्थता व्यावहारिकता के अभाव में विद्वान तो बना सकती है लेकिन यह शारीरिक श्रम के प्रति घृणा का भाव भर सकती है और समाज निरपेक्ष होने पर इसका हश्र पंचतंत्र की कथा ‘महाजन: येन गत: सो पंथ:’ के छात्रों की भांति हो सकती है। विद्वता यदि समाज से रस लेते हुए विकसित होती है तो वह महान विचारों को जन्म दे जाती है। आविष्कारें सामने लाती है।

देश में निरक्षरों की एक बङी फौज होते हुए भी मताधिकार के द्वारा अपनी पसंद की सरकार को चुन लेते हैं । उनकी सहज बुद्धि कह जाती है जो उन्हें कहना होता है। उनके ‘ज्ञान’ का स्रोत है लोक समाज में व्याप्त विचार और विश्वास। इस प्रकार स्पष्ट है कि बुद्धि पर किसी का विशेषाधिकार नहीं होता। शिक्षा पर पहरा हो सकता है। साक्षरता का प्रसार देश व समाज के लिए अनिवार्य होता है लेकिन शत प्रतिशत साक्षरता भी इस बात को प्रत्याभूत नहीं कर सकती कि समाज में कोई बङी समस्या नहीं रहेगी। भौतिक जीवन में ज्ञानी की पहचान की अनिवार्य शर्त है कि कोई व्यक्ति में नागरिक बोध (सिविक सेंस) गहरा हो। ज्ञानी व्यक्ति आत्मकेन्द्रित नहीं हो सकता। ज्ञान दायित्व सौंपता है कि वह “मैं’ को विस्तृत कर सके। मैं से केवल अहंकारी दायित्वविहीन होने का अहसास होता है जो समाज के लिए अनुपयोगी है। चालाक लोग प्राय: ‘मैं’को ‘हम’ बनाकर पेश कर देते हैं और कभी -कभी सफल भी हो जाते हैं ।

आज देश के सामने कई समस्याएं हैं। इन समस्याओं के निराकरण के लिए राज्य प्रयासरत भी है। उसकी कोशिशों की सीमाएं भी है। संसाधन सीमित हैं। यदि अपने ज्ञान के आधार पर राज्य की सीमाओं का अहसास है तो अपने उसी ज्ञान के आधार पर उसके समाधान में सहयोग देने का भी भाव हममें जरूरी है। राज्य का निर्माण हम भारत के लोगों ने ही किया है। इसे पेटजीवी लोगों का हथकंडा नहीं माना जा सकता है। बुद्धिजीवि, ज्ञानी का पर्याय तभी बन सकता है जब वह रचनात्मकता के साथ समस्याओं को सुलझाने में विचारधारा का आलंबन या वादपरस्ती छोङकर आगे बढने का रास्ता अख्तियार करने का हौसला रख पाने में सक्षम है। परम सत्य तो केवल मृत्यु है शेष मृत्यु के पहले की पीङा जन्य आचार व्यवहारें हैं जो अलग-अलग नामों से शवयात्रा को आगे बढाते जाती हैं ।

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